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Chapter 17 शिरीष के फूल Solutions

Question - 11 : -
हज़ारी प्रसाद विवेदी ने इस पाठ की तरह ही वनस्पतियों के संदर्भ में कई व्यक्तित्व व्यंजक ललित निबंध और लिखें हैं- कुटज, आम फिर बौरा गए, अशोक के फूल, देवदारु आदि। शिक्षक की सहायता से उन्हें ढूंढ़िए और पढ़िए।

Answer - 11 : -

विद्यार्थी स्वयं करें।

Question - 12 : - विवेदी जी की वनस्पतियों में ऐसी रुचि का क्या कारण हो सकता है? आज साहित्यिक रचना फलक पर प्रकृति की उपस्थिति न्यून से न्यून होती जा रही है।

Answer - 12 : -

तब ऐसी रचनाओं का महत्त्व बढ़ गया है। प्रकृति के प्रति आपका दृष्टिकोण रुचिपूर्ण या उपेक्षामय है? इसका मूल्यांकन करें।

उत्तर:

विवेदी जी का जीवन प्रकृति के उन्मुक्त आँगन में ज्यादा रमा है। प्रकृति उनके लिए शक्ति और प्रेरणादायी रही है इसीलिए उन्होंने अपने साहित्य में प्रकृति का चित्रण किया है। वे वनस्पतियाँ हमारे जीवन का आधार हैं। इनके बिना जीवन की कल्पना करना असंभव है। कवि क्योंकि कुछ ज्यादा ही भावुक या संवेदनशील होता है, इसीलिए वह प्रकृति के प्रति ज्यादा संजीदा हो जाता है। मैं स्वयं प्रकृति के प्रति रुचिपूर्ण रवैया रखता हूँ। प्रकृति को जीवन शक्ति के रूप में ग्रहण किया जाना चाहिए। प्रकृति के महत्त्व को रेखांकित करते हुए पंत जी कहते हैं –
छोड़ दूमों की मृदुल छाया
बदले! तेरे बाल जाल में कैसे उलझा हूँ लोचन?
यदि हम प्रकृति को सहेजकर रखेंगे तो हमारा जीवन सुगम और तनाव रहित होगा। प्रकृति संजीवनी है। अतः इसकी उपेक्षा करना अपने अस्तित्व को खतरे में डालने जैसा है।

Question - 13 : -
दस दिन फूले फिर खंखड़-खंखड़ इस लोकोक्ति से मिलते-जुलते कई वाक्यांश पाठ में हैं, उन्हें छाँट कर लिखें।

Answer - 13 : -

  1. ऐसे दुमदारों से तो लँडूरे भले।
  2. मेरे मानस में थोड़ा हिल्लोल ज़रूर पैदा करते हैं।
  3. वे चाहें तो लोहे का पेड़ बनवा लें।
  4. किसी प्रकार जमाने का रुख नहीं पहचानते।
  5. धरा को प्रमान यही तुलसी जो फरा सो झरा, जो बरा सो बुताना।
  6. न ऊधो का लेना न माधो का देना।
  7. कालदेवता की आँख बचा जाएँ।
  8. रह-रहकर उसका मन खीझ उठता था।
  9. खून-खच्चर का बवंडर बह गया।

Question - 14 : -
निबंधकार ने किस तरह कोमल और कठोर दोनों भावों का सम्मिश्रण शिरीष के माध्यम से किया है?

Answer - 14 : -

प्रत्येक वस्तु अथवा व्यक्ति में दो भाव एक साथ विद्यमान रहते हैं। उसमें कोमलता भी रहती है और कठोरता भी। संवेदनशील प्राणी कोमल भावों से युक्त होगा लेकिन समाज में अपने को बनाए रखने के लिए कठोर भावों का होना भी अनिवार्य है। ठीक यही बात शिरीष के फूल पर भी लागू होती है। यद्यपि संस्कृत साहित्य में शिरीष के फूल को अत्यंत कोमल माना गया है तथापि लेखक का कहना है कि इसके फल बहुत कठोर (मजबूत) होते हैं। वे नए फूलों के आ जाने पर भी नहीं निकलते, वहीं डटे रहते हैं।

कोमलता और कठोरता के माध्यम से इस निबंध के लालित्य को इन शब्दों में निबंधकार ने प्रस्तुत किया है-”शिरीष का फूल संस्कृत साहित्य में बहुत कोमल माना गया है। मेरा अनुमान है कि कालिदास ने यह बात शुरू-शुरू में प्रचार की होगी। कह गए हैं, शिरीष पुष्प केवल भौंरों के पदों का कोमल दबाव सहन कर सकता है, पक्षियों का बिलकुल नहीं। …. शिरीष के फूलों की कोमलता देखकर परवर्ती कवियों ने समझा कि उसका सब कुछ कोमल है। यह भूल है। इसके फल इतने मज़बूत होते हैं कि नए फूलों के निकल आने पर भी स्थान नहीं छोड़ते। जब तक नए फल, पत्ते मिलकर धकियाकर उन्हें बाहर नहीं कर देते तब तक वे डटे रहते हैं।

Question - 15 : -
‘शिरीष के फूल’ शीर्षक निबंध किस श्रेणी का निबंध है? इस पर प्रकाश डालिए?

Answer - 15 : -

हजारी प्रसाद द्विवेदी जी ने कई विषयों पर निबंध लिखे हैं। उनके निबंधों को कई वर्गों में विभाजित किया जा सकता है। उन्होंने ज्यादातर ललित निबंध लिखें हैं। अपनी निबंध कला से आचार्य द्विवेदी ने हिंदी ललित निबंध साहित्य को विकसित किया है। उनके साहित्यिक निबंध ही ललित निबंध हैं। अनेक विद्वान भी ऐसा ही मानते हैं। ललित निबंध क्या है इस बारे में डॉ. बैजनाथ सिंहल ने लिखा है-शोधार्थी ललित निबंध को सामान्यतः जिसे हम निबंध कहते हैं। ऊलगते हुए केवल एक ही आधार को अपनाते दिखाई देते हैं-यह आधार है लालित्य का। ललित शब्द को लेकर किसी विधा के अंतर्गत एक अलग विधा को बनाया जाना स्वीकार नहीं हो सकता। लालित्य साहित्य मात्र में रहता है तथा ललित कलाओं में साहित्य लालित्य के कारण ही सर्वोच्च कला है। इसलिए लालित्य तो साहित्य का अंतवर्ती तत्व है। डॉ० हजारी प्रसाद का ‘शिरीष के फूल’ शीर्षक निबंध भी एक ललित निबंध है।

Question - 16 : -
प्रकृति के माध्यम से आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने लालित्य दिखाने का सफल प्रयास किया है, सिद्ध करें।

Answer - 16 : -

‘शिरीष के फूल’ शीर्षक निबंध की रचना का मूलाधार प्रकृति है। निबंधकार ने प्रकृति को आधार बनाकर इस निबंध की रचना की है। इसलिए इस निबंध में लेखक ने प्रकृति के माध्यम से लालित्य दिखाने का सफल प्रयास किया है। प्रकृति का इतना मनोरम और यथार्थ चित्रण निबंध को लालित्य से परिपूर्ण कर देता है। लेखक ने बड़े सुंदर शब्दों में प्रकृति को चित्रित किया है। शिरीष के फूल का वर्णन इस प्रकार किया है-
“वसंत के आगमन से लहक उठता है, आषाढ़ तक तो निश्चित रहता रूप से मस्त बना रहता है। मन रम गया तो भरे भादों में भी निर्यात फूलता रहता है। …एक-एक बार मुझे मालूम होता है कि यह शिरीष का एक अद्भुत अवधूत है। दुख हो या सुख, वह हार नहीं मानता। न ऊधो का लेना, न माधो का देना। जब धरती और आसमान जलते रहते हैं तब भी यह हज़रत न जाने कहाँ से अपना रस खींचते रहते हैं। मौज में आठों याम मस्त रहते हैं। एक वनस्पति शास्त्री ने मुझे बताया है कि यह उस श्रेणी का पेड़ है जो वायुमंडल से अपना रस खींचता है। ज़रूर खींचता होगा, नहीं तो भयंकर लू के समय इतने कोमल ततुंजाल और ऐसे सकुमार केसर को कैसे उगा सकता था?”

Question - 17 : - यह निबंध भावों की गंभीरता को समुच्चय जान पड़ता है। प्रस्तुत पाठ के आधार पर इस कथन की समीक्षा कीजिए।

Answer - 17 : -

विचारों के साथ ही भावों की प्रधानता भी इस निबंध में मिलती है। भाव तत्व निबंध का प्रमुख तत्व है। इसी तत्व के आधार पर निबंधकार मूल भावना या चेतना प्रस्तुत कर सकता है। वातावरण का पूर्ण ज्ञान उन्हें था। कवि न होने के बावजूद भी प्रकृति को चित्रण भावात्मक ढंग से करते थे। प्रकृति के प्रत्येक परिवर्तन का उन पर गहरा प्रभाव होता था। वे भावुक थे इसलिए प्रकृति में होने वाले नित प्रति परिवर्तनों से वे भावुक हो जाते थे। इस बात को स्वीकारते हुए वे लिखते हैं –
 
“यद्यपि कवियों की भाँति हर फूल पत्ते को देखकर मुग्ध होने लायक हृदय विधाता ने नहीं दिया है, पर नितांत ढूँठ भी नहीं हैं। शिरीष के पुष्प मेरे मानस में थोडा हिल्लोल ज़रूर पैदा करते हैं।” निबंधकार का मानना है कि व्यक्तियों की तरह शिरीष का पेड़ भी भावुक होता है। उसमें भी संवेदनाएँ और भावनाएँ भरी होती हैं – “एक-एक बार मुझे मालूम होता है। कि यह शिरीष एक अद्भुत अवधूत हैं। दुख हो या सुख वह हार नहीं मानता न ऊधो को लेना न माधो का देना। जब धरती और आसमान जलते रहते हैं तब भी यह हज़रत न जाने कहाँ से अपना रस खींचते रहते हैं। मौज में आठों याम मस्त रहते हैं।” अतः निबंधकार ने इस निबंध में भावात्मकता का गुण भरा है।

Question - 18 : -
जीवन शक्ति का संदेश इस पाठ में छिपा हुआ है? कैसे? स्पष्ट करें।

Answer - 18 : -

द्विवेदी जी ने इस निबंध में फूलों के द्वारा जीवन शक्ति की ओर संकेत किया है। लेखक बताता है कि शिरीष का फूल हर हाल में स्वयं के अस्तित्व को बनाए रखता है। इस पर गरमी-लू आदि का कोई प्रभाव नहीं होता क्योंकि इसमें जीवन जीने की लालसा है। इसमें आशा का संचार होता रहता है। यह फूल तो समय को जीतने की क्षमता रखता है। विपरीत परिस्थितियों में जो जीना सीख ले उसी का जीवन सार्थक है। शिरीष के फूलों की जीवन शक्ति की ओर संकेत करते हुए निबंधकार ने लिखा है-

“फूल है शिरीष। वसंत के आगमन के साथ लहक उठता है, आषाढ़ तक तो निश्चित रूप से मस्त बना रहता है। मन रम गयो तो भरे भादों में भी निर्यात फूलता रहता है। जब उमस से प्राण उबलता रहता है और लू से हृदय सूखता रहता है, एकमात्र शिरीष कालजयी अवधूत की भाँति जीवन की अजेयता का मंत्र प्रचार करता रहता है।” इस प्रकार निबंधकार ने शिरीष के फूल के माध्यम से जीवन को हर हाल में जीने की प्रेरणा दी है। उन्होंने कई भावों को इस निबंध में प्रस्तुत किया है। यह निबंध संवेदनाओं से भरपूर है। इन संवेदनाओं और भावनाओं का विस्तारपूर्वक चित्रण आचार्य जी ने किया है। यह एक श्रेष्ठ निबंध है।

Question - 19 : -
निबंधकार का अधिकार लिप्सा से क्या आशय है?

Answer - 19 : -

इस निबंध में एक प्रसंग में निबंधकार ने अधिकार लिप्सा की बात कही है। इस तथ्य ने भी प्रस्तुत निबंध के लालित्य को बढ़ाया है। निबंधकार कहता है कि प्रत्येक में अधिकार लिप्सा होनी चाहिए लेकिन अधिकार लिप्सा का अर्थ यह है। कि जीवनभर आप एक ही जगह जमे रहो। दूसरों को भी मौका देना चाहिए ताकि उनकी योग्यता को सिद्ध किया जा सके। “वसंत के आगमन के समय जब सारी वनस्थली पुष्प-पुत्र से मर्मरित होती रहती है, शिरीष के पुराने फल बुरी तरह लड़खड़ाते रहते हैं। मुझे इनको देखकर उन नेताओं की याद आती है जो किसी प्रकार ज़माने का रुख नहीं पहचानते और जब तक नई पौध के लोग उन्हें धक्का मारकर निकाल नहीं देते तब तक जमे रहते हैं। मैं सोचता हूँ पुराने की यह अधिकार लिप्सा क्यों नहीं समय रहते सावधान हो जाती?” इस तरह निबंधकार ने अधिकार भावना को नए अर्थों में प्रस्तुत कर इस निबंध की लालित्य योजना को प्रभावी बना दिया है।

Question - 20 : -
व्यंग्यात्मकता इस निबंध की मूल चेतना है। प्रस्तुत पाठ के आलोक में इस पर प्रकाश डालिए।

Answer - 20 : -

इस तत्व का प्रयोग करके निबंधकार ने अपने निबंध को बोझिल होने से बचा लिया है। डॉ. सक्सेना के शब्दों में आपकी रचना पद्धति में कहीं-कहीं व्यंग्य एवं विनोद भी विद्यमान है। आपको यह व्यंग्य अधिक कटु एवं तीखा नहीं होता किंतु मर्मस्पर्शी होता है और हृदय को सीधी चोट न पहुँचाकर स्थायी प्रभाव डालने वाला होता है। परंतु निबंध में व्यंग्य तत्व का स्वाभाविक प्रयोग हुआ है। द्विवेदी जी ने शिरीष के पेड़ की शाखाओं की कमजोरी और कवियों के मोटापे पर व्यंग्य करते हुए लिखा है-
यद्यपि पुराने कवि बहुल के पेड़ में ऐसी दोलाओं को लगा देखना चाहते थे पर शिरीष भी क्या बुरा है? डाल इसकी अपेक्षाकृत कमज़ोर ज़रूर होती हैं पर उसमें झूलने वालियों का वजन भी तो ज्यादा नहीं होता। कवियों की यही तो बुरी आदत है कि वज़न का एकदम ख्याल नहीं करते। मैं तुंदिल नरपतियों की बात नहीं कर रहा हूँ, वे चाहें तो लोहे का पेड़ लगवा लें। इस निबंध की एक और विशेषता है-स्पष्टता। विवेदी जी ने जो विचार अथवा भाव प्रकट किए हैं उनमें स्पष्टता का गुण विद्यमान है। उनके भावों में कोई उलझाव या बिखराव नहीं है।

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