Question -
Answer -
‘शिरीष के फूल’ शीर्षक निबंध की रचना का मूलाधार प्रकृति है। निबंधकार ने प्रकृति को आधार बनाकर इस निबंध की रचना की है। इसलिए इस निबंध में लेखक ने प्रकृति के माध्यम से लालित्य दिखाने का सफल प्रयास किया है। प्रकृति का इतना मनोरम और यथार्थ चित्रण निबंध को लालित्य से परिपूर्ण कर देता है। लेखक ने बड़े सुंदर शब्दों में प्रकृति को चित्रित किया है। शिरीष के फूल का वर्णन इस प्रकार किया है-
“वसंत के आगमन से लहक उठता है, आषाढ़ तक तो निश्चित रहता रूप से मस्त बना रहता है। मन रम गया तो भरे भादों में भी निर्यात फूलता रहता है। …एक-एक बार मुझे मालूम होता है कि यह शिरीष का एक अद्भुत अवधूत है। दुख हो या सुख, वह हार नहीं मानता। न ऊधो का लेना, न माधो का देना। जब धरती और आसमान जलते रहते हैं तब भी यह हज़रत न जाने कहाँ से अपना रस खींचते रहते हैं। मौज में आठों याम मस्त रहते हैं। एक वनस्पति शास्त्री ने मुझे बताया है कि यह उस श्रेणी का पेड़ है जो वायुमंडल से अपना रस खींचता है। ज़रूर खींचता होगा, नहीं तो भयंकर लू के समय इतने कोमल ततुंजाल और ऐसे सकुमार केसर को कैसे उगा सकता था?”