Chapter 15 खाद्य संसाधनों में सुधार Solutions
Question - 11 : - निम्नलिखित कथन की विवेचना कीजिए-
”यह रुचिकर है कि भारत में कुक्कुट, अल्प रेशे के खाद्य पदार्थों को उच्च पोषकता वाले पशु प्रोटीन आहार में परिवर्तन करने के लिए सबसे अधिक सक्षम है। अल्प रेशे के खाद्य पदार्थ मनुष्यों के लिए उपयुक्त नहीं होते हैं।”
Answer - 11 : -
कुक्कुट विशेषकर किसान पालता है या मुर्गीपालन घरों में किया जाता है जहाँ खाली स्थान ज्यादा हो और पशु भी पाले जा रहे होते हैं। मुर्गी को मांस (ब्रौलर) व अण्डे प्राप्त करने के लिए पाला जाता है। ये अण्डे देने वाले पक्षी (कुक्कुट) कृषि के उपोत्पाद से प्राप्त सस्ते रेशेदार पदार्थों को भोजन के रूप में उपयोग करते हैं और उसे प्रोटीन आहार के रूप में परिवर्तित करते हैं अर्थात् इनके अण्डों में व मांस में प्रोटीन की मात्रा अधिक होती है।
अत: यह ठीक है कि कुक्कुट कम रेशेदार को उच्चकोटि के पशु प्रोटीन आहार में परिवर्तित कर देते हैं।
Question - 12 : - पशुपालन तथा कुक्कुट पालने के प्रबंधन प्रणाली में क्या समानता है?
Answer - 12 : -
दोनों के पालन के लिए निम्नलिखित बातें आवश्यक हैं-
- उचित आवास व्यवस्था
- उचित प्रकाश की व्यवस्था स्था
- उचित पोषण व्यवस्था
- समय पर टीकाकरण
- विकसित नस्लों का उपयोग
- सफाई तथा स्वच्छता का प्रबन्ध।
Question - 13 : - ब्रौलर तथा अंडे देने वाली लेयर में क्या अंतर है? इनके प्रबंधन के अन्तर को भी स्पष्ट करो।
Answer - 13 : -
अंडों के उत्पादन के लिए पाली गयी कुक्कुट लेयर व मांस उत्पादन के लिए पाले गये कुक्कट ब्रौलर कहलाते हैं। कुक्कुट अनाज, कीड़े-मकोड़े, सब्जियों के अपशिष्ट तथा कुछ कंकड़ आदि पर पोषित किये जाते हैं। ब्रौलर के आहार में प्रोटीन तथा वसा प्रचुर मात्रा में होनी चाहिए।
इनके आवास में उचित ताप तथा स्वच्छता रखनी भी आवश्यक है। स्वच्छता के साथ नियमित रूप से रोगाणुनाशक का छिड़काव करना चाहिए। इनमें जीवाणु, विषाणु, कवक, परजीवी आदि से कई प्रकार के रोग हो सकते हैं अतः रोगों से बचाने के लिए टीका लगवाना चाहिए।
Question - 14 : - मछलियाँ कैसे प्राप्त करते हैं?
Answer - 14 : -
मछली को समुद्र से या अलवणीय जल में से जाल द्वारा पकड़कर प्राप्त किया जाता है। मछली को पकड़ने के लिए विभिन्न प्रकार के जालों का उपयोग नाव से किया जाता है। सैटेलाइट तथा प्रति ध्वनि गंभीरतामापी से खुले समुद्र में मछलियों के बड़े समूह का पता लगाया जाता है जिससे मछली का उत्पादन बढ़ जाता है। अधिक आर्थिक महत्त्व वाली समुद्री मछलियों का समुद्री जल में संवर्धन भी किया जाता है। समुद्र में मछली संवर्धन को मैरीकल्चर कहते हैं।
Question - 15 : - मिश्रित मछली संवर्धन के क्या लाभ हैं?
Answer - 15 : -
मिश्रित मछली संवर्धन, अधिक मछली संवर्धन की विधि है। इसमें देशी तथा विदेशी प्रकार की मछलियों | का उपयोग किया जाता है। ऐसे तंत्र में अकेले तालाब में 5 या 6 मछली स्पीशीज का उपयोग किया जाता है। इनमें ऐसी मछलियों को चुना जाता है जिनमें आहार के लिए। प्रतिस्पर्धा न हो और उनके आहार की आदत अलग-अलग हों। इसके फलस्वरूप तालाब के हर भाग में स्थित प्राप्त आहार का उपयोग हो जाता है, जैसे-कटला मछली पानी की सतह से अपना भोजन लेती है। मृगल तथा कॉमन कार्प तालाब की तली से भोजन लेती है। रोहू मछली तालाब के मध्य क्षेत्र से अपना भोजन लेती है। ग्रास कार्य खरपतवार खाती है। इस प्रकार ये सभी मछलियाँ साथ-साथ रहते हुए भी बिना स्पर्धा से अपना-अपना आहार लेती हैं, जिससे मछली के उत्पादन में वृद्धि होती है।
Question - 16 : - मधु उत्पादन के लिए प्रयुक्त मधुमक्खी में कौन-कौन से ऐच्छिक गुण होने चाहिए?
Answer - 16 : -
मधु उत्पादन के लिए प्रयुक्त मधुमक्खी में निम्नलिखित ऐच्छिक गुण होने चाहिए-
- इनमें मधु इकट्ठा करने की क्षमता अधिक होनी चाहिए।
- डंक कम मारने का स्वभाव।
- छत्ते में काफी समय तक रहे।
- प्रजनन तीव्रता से करें।
- इन सब गुणों के लिए इटेलियन मधुमक्खी का उपयोग किया जाता है।
Question - 17 : - चरागाह क्या है और ये मधु उत्पादन से कैसे सम्बन्धित है?
Answer - 17 : -
वह वनस्पति क्षेत्र जहाँ से मधुमक्खियाँ मकरन्द तथा परागकण एकत्रित करती है, चरागाह कहलाता है। ये क्षेत्र भौगोलिक स्थिति व क्षेत्र के आधार पर भिन्न-भिन्न होते हैं इसी कारण शहद (मधु) की गुणवत्ता व स्वाद चरागाह | में मधुमक्खी को उपलब्धं फूलों की किस्मों पर आधारित होता है। क्योंकि ये मधुमक्खियाँ मकरंद तथा पराग को फूलों से एकत्रित करती हैं। कश्मीर का बादामी शहद स्वाद में उत्तम होता है। मधुमक्खियाँ चरागाह में बादाम, महुआ, आम, नारियल, इमली, लीची, सेब, अमरूद, सूरजमुखी व बेर इत्यादि के फूलों का मकरन्द वे परागकण इकट्ठा करती हैं। और भिन्न-भिन्न प्रकार का शहद उत्पन्न करती हैं।
Question - 18 : - फसल उत्पादन की एक विधि का वर्णन करो जिससे अधिक पैदावार प्राप्त हो सके।
Answer - 18 : -
फसल उत्पादन की फसल किस्मों में सुधार विधि’ एक ऐसी विधि है जिससे अधिक पैदावार प्राप्त होती है। “फसल किस्मों में सुधार-इसमें किसान को विभिन्न गुणों, जैसे रोग प्रतिरोधिता, उर्वरक के प्रति अनुरूपता, उत्पादन की गुणवत्ता तथा उच्च उत्पादन क्षमता के लिए फसलों की किस्मों का चुनाव प्रजनन द्वारा करना चाहिए। फसलों में ऐच्छिक गुण संकरण द्वारा भी डाले जा सकते हैं। संकरण की यह विधि अन्तराकिस्मीय (विभिन्न किस्मों), अन्तरास्पीशीज (विभिन्न स्पीशीज) और अन्तरावंशीय (विभिन्न जैनरा) भी हो सकता है। फसल सुधार की दूसरी विधि है, ऐच्छिक गुणों वाले जीन का डालना। इससे आनुवंशकीय रूपांतरित फसल प्राप्त होती है। इस कार्य के लिए अच्छी गुणवत्ता वाले विशेष बीज अपनाने चाहिए, और बीज उसी किस्म के होने चाहिए जो अनुकूल परिस्थिति में उग सके। कृषि प्रणाली व फसल उत्पादन मौसम, पानी तथा मिट्टी की गुणवत्ता पर निर्भर होती है। फसलें ऐसी हों जो प्रत्येक प्रकार की मिट्टी व जलवायु की विभिन्न परिस्थितियों में भी उग सकें।
Question - 19 : - खेतों में खाद तथा उर्वरक का उपयोग क्यों करते हैं?
Answer - 19 : -
खेतों में खाद तथा उर्वरक का उपयोग भूमि की उपजाऊ शक्ति बनाए रखने के लिए किया जाता है। फसल के उगने में अर्थात् बीज बोने से परिपक्वन काल तक पौधे भूमि के 13 प्रकार के पोषक तत्त्व ग्रहण करते हैं जिससे ये तत्त्व भूमि में कम हो जाते हैं। भूमि में खाद मिट्टी की उर्वरता को बढ़ाती है और मिट्टी की रचना व पानी धारण करने की क्षमता बढ़ जाती है। उर्वरक पौधे की कायिक वृद्धि में सहायक होते हैं और पौधों को स्वस्थ रखने में सहायक होते हैं।
Question - 20 : - अन्तराफसलीकरण तथा फसल-चक्र के क्या लाभ हैं?
Answer - 20 : -
अन्तराफसलीकरण तथा फसल-चक्र खरपतवार को नियंत्रित करने में सहायक होते हैं। इन विधियों द्वारा पीड़कों पर भी नियंत्रण किया जा सकता है, फसलों की उत्पादकता बढ़ाई जा सकती है और भूमि की उपजाऊ शक्ति भी बनी रहती है।