Chapter 5 पृष्ठ रसायन (Surface Chemistry) Solutions
Question - 11 : - अधिशोषण एवं अवशोषण शब्दों (पदों) के तात्पर्य में विभेद कीजिए। प्रत्येक का एक उदाहरण दीजिए।
Answer - 11 : - अधिशोषण तथा अवशोषण में अन्तर
Question - 12 : - भौतिक अधिशोषण एवं रासायनिक अधिशोषण में क्या अन्तर है?
Answer - 12 : - भौतिक अधिशोषण एवं रासायनिक अधिशोषण में अन्तर
Question - 13 : - कारण बताइए कि सूक्ष्म-विभाजित पदार्थ अधिक प्रभावी अधिशोषक क्यों होता है?
Answer - 13 : - सूक्ष्म विभाजित पदार्थ में सतही क्षेत्रफल (surface area) अधिक होने के कारण अधिशोषण के लिए अधिक सक्रिय केन्द्र उपस्थित होते हैं, इसलिए सूक्ष्म विभाजित पदार्थ अधिक प्रभावी अधिशोषक होते है।
Question - 14 : - किसी ठोस पर गैस के अधिशोषण को प्रभावित करने वाले कारक कौन-से हैं?
Answer - 14 : -
- अधिशोष्य तथा अधिशोषक की प्रकृति
- अधिशोषक का विशिष्ट सतही क्षेत्रफल तथा इसका सक्रियण
- गैस का दाब
- तापमान।
Question - 15 : - अधिशोषण समतापी वक्र क्या है? फ्रॉयडलिक अधिशोषण समतापी वक्र का वर्णन कीजिए।
Answer - 15 : -
अधिशोषण समतापी वक्र (Adsorption isotherm) – अधिशोषक के प्रति ग्राम में अधिशोषित गैस की मात्रा तथा स्थिर ताप पर अधिशोष्य (गैस) के दाब के बीच खींचा गया वक्र अधिशोषण समतापी वक्र कहलाता है।
फ्रॉयन्डलिक अधिशोषण समतापी वक्र (Freundlich adsorption isotherm) – फ्रॉयन्डलिक ने सन् 1909 में ठोस अधिशोषक के इकाई द्रव्यमान द्वारा एक निश्चित ताप पर अधिशोषित गैस की मात्रा एवं दाब के मध्य एक प्रयोग पर आधारित सम्बन्ध दिया। सम्बन्ध को निम्नलिखित समीकरण द्वारा व्यक्त किया जा सकता है –
= kp1/n (n > 1)जहाँ x, अधिशोषक के m द्रव्यमान द्वारा p दाब पर अधिशोषित गैस का द्रव्यमान है। k एवं n स्थिरांक हैं जो कि किसी निश्चित ताप पर अधिशोषक एवं गैस की प्रकृति पर निर्भर करते हैं। सम्बन्ध को सामान्यतया एक वक्र के रूप में निरूपित किया जाता है जिसमें अधिशोषक के प्रति ग्राम द्वारा अधिशोषित गैस का द्रव्यमान दाब के विपरीत आलेखित किया जाता है (चित्र-1)। ये वक्र व्यक्त करते हैं कि एक निश्चित दाब पर, ताप बढ़ाने से भौतिक अधिशोषण घटता है। ये वक्र उच्च दाब पर सदैव संतृप्तता की ओर बढ़ते प्रतीत होते हैं।
समीकरण(i) का लघुगणक लेने पर,
log
= log k +
log p …(ii) फ्रॉयन्डलिक समतापी वक्र की वैधता, आलेख में log
को Y-अक्ष (कोटि) एवं log p को X- अक्ष (भुज) पर लेकर प्रमाणित की जा सकती है। यदि यह एक सीधी रेखा आती है तो फ्रॉयन्डलिक वक्र प्रमाणित है, अन्यथा नहीं (चित्र-2)। सीधी रेखा का ढाल
का मान देता है। Y- अक्ष पर अन्त:खण्ड log k का मान देता है।फ्रॉयन्डलिक समतापी अधिशोषण के व्यवहार की सन्निकट व्याख्या करता है। गुणक
का मान 0 एवं 1 के मध्य हो सकता है (अनुमानित सीमा 0.1 से 0.5)। अत: समीकरण (ii) दाब के सीमित विस्तार तक ही लागू होती है।
(i) जब
= 0,
= स्थिरांक, अतः अधिशोषण दाब से स्वतन्त्र है।(ii)
= 1,
= kp अर्थात्
∝ p, अत: अधिशोषण में परिवर्तन दाब के अनुक्रमानुपाती है। दोनों ही प्रतिबन्धों का प्रायोगिक परिणामों से समर्थन होता है। प्रायोगिक समतापी सदैव उच्च दाब पर संतृप्तता की ओर अभिगमन करते प्रतीत होते हैं। इसे फ्रॉयन्डलिक समतापी से नहीं समझाया जा सकता। इस प्रकार यह उच्च दाब पर असफल हो जाता है।
Question - 16 : - अधिशोषक के सक्रियण से आप क्या समझते हैं? यह कैसे प्राप्त किया जाता है?
Answer - 16 : -
अधिशोषक के सक्रियण से तात्पर्य अधिशोषक की अधिशोषण क्षमता को बढ़ाना है। इसे अधिशोषक के पृष्ठीय क्षेत्रफल को बढ़ाकर किया जा सकता है। अधिशोषक के पृष्ठीय क्षेत्रफल को निम्नलिखित विधियों द्वारा बढ़ाया जा सकता है –
- अधिशोषित गैसों को हटाकर अर्थात् चारकोल को 650 K से 1330 K के मध्य ताप पर निर्वात् अथवा अतितप्त भाप में गर्म करके सक्रिय किया जा सकता है।
- अधिशोषक को बारीक पीसकर अर्थात् सूक्ष्म विभाजित करके इसकी अधिशोषण क्षमता बढ़ाई जा सकती है।
- अधिशोषक की सतह को खुरदरा करके भी इसकी अधिशोषण क्षमता अर्थात् सक्रियता बढ़ाई जो सकती है।
Question - 17 : - विषमांगी उत्प्रेरण में अधिशोषण की क्या भूमिका है?
Answer - 17 : - विषमांगी उत्प्रेरण में सामान्यत: ठोस अधिशोषक (उत्प्रेरक) तथा अभिकारक गैसें होती हैं। अभिक्रिया उत्प्रेरक की सतह पर होती है जहाँ अभिकारक अणु (अधिशोष्य) रासायनिक अधिशोषित होते हैं।
Question - 18 : - विषमांगी उत्प्रेरण में अधिशोषण की क्या भूमिका है?
Answer - 18 : - विषमांगी उत्प्रेरण में सामान्यत: ठोस अधिशोषक (उत्प्रेरक) तथा अभिकारक गैसें होती हैं। अभिक्रिया उत्प्रेरक की सतह पर होती है जहाँ अभिकारक अणु (अधिशोष्य) रासायनिक अधिशोषित होते हैं।
Question - 19 : - अधिशोषण हमेशा ऊष्माक्षेपी क्यों होता है?
Answer - 19 : -
अधिशोषण होने पर पृष्ठ के अवशिष्ट बलों में सदैव कमी आती है अर्थात् पृष्ठ ऊर्जा में कमी आती है जो कि ऊष्मा के रूप में प्रकट होती है। अत: अधिशोषण सदैव एक ऊष्माक्षेपी प्रक्रम होता है। दूसरे शब्दों में, अधिशोषण का ΔH हमेशा ऋणात्मक होता है। जब एक गैस अधिशोषित होती है तो इसके अणुओं का संचलन सीमित हो जाता है। इससे अधिशोषण के पश्चात् गैस की एन्ट्रॉपी घट जाती है। किसी प्रक्रम के स्वत:प्रवर्तित होने के लिए ऊष्मागतिकीय आवश्यकता यह है कि स्थिर ताप एवं दाब पर ΔG ऋणात्मक होना चाहिए अर्थात् गिब्ज ऊर्जा में कमी होनी चाहिए।
समीकरण ΔG = ΔH – T ΔS के आधार पर ΔG तभी ऋणात्मक हो सकता है जब ΔH का मान पर्याप्त ऋणात्मक हो क्योकि – T ΔS का मान धनात्मक है। अत: अधिशोषण प्रक्रम में, जो कि स्वत:प्रवर्तित होती है, इन दोनों गुणकों का संयोजन ΔG को ऋणात्मक बनाता है। जैसे-जैसे अधिशोषण बढ़ता है ΔH कम ऋणात्मक होता जाता है एवं अन्त में ΔH, T ΔS के तुल्य हो जाता है एवं ΔG की मान शून्य हो जाता है। इसे अवस्था पर साम्य स्थापित हो जाता है।
Question - 20 : - कोलॉइडी विलयनों को परिक्षिप्त प्रावस्था एवं परिक्षेपण माध्यम की भौतिक अवस्थाओं के आधार पर कैसे वर्गीकृत किया जाता है?
Answer - 20 : -
परिक्षिप्त प्रावस्था एवं परिक्षेपण माध्यम की भौतिक अवस्थाओं के आधार पर वर्गीकरण (Classification based on the Physical state of Dispersed phase and Dispersion medium) – परिक्षिप्त प्रावस्था तथा परिक्षेपण माध्यम की भौतिक अवस्थाओं के आधार पर आठ प्रकार के कोलॉइडी तन्त्र सम्भव हैं। एक गैस का दूसरी गैस के साथ मिश्रण समांगी होता है, अत: यह कोलॉइडी तन्त्र नहीं होता। विभिन्न प्रकार के कोलॉइडों के उदाहरण उनके विशिष्ट नामों सहित निम्नांकित सारणी में दिए गए हैं –
सारणी – कोलॉइडी तन्त्रों के प्रकार (Types of Colloidal Systems)
अनेक परिचित व्यावसायिक उत्पाद एवं प्राकृतिक वस्तुएँ कोलॉइड हैं; उदाहरणार्थ– फेंटी हुई क्रीम झाग है जिसमें गैस, द्रव में परिक्षिप्त है। हवाई जहाजों के आपातकालीन अवतारण (emergency landing) के समय उपयोग किए जाने वाले अग्निशामक फोम भी कोलॉइडी तन्त्र होते हैं। अधिकांश जैविक तरले, जलीय सॉल (जल परिक्षिप्त ठोस) होते हैं। एक प्रारूपी कोशिका में उपस्थित प्रोटीन एवं न्यूक्लीक अम्ल कोलॉइड के आकार के कण होते हैं जो आयनों एवं लघु अणुओं के जलीय विलयन में परिक्षिप्त होते हैं।