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वर्ग 1 के तत्व: क्षार धातुएँ (Elements of Group 1:Alkali Metals) क्षार धातुओं के भौतिक तथा रासायनिक गुणों में परमाणु क्रमांक के साथ एक नियमित प्रवृत्ति पाई जाती है। इन तत्वों के भौतिक तथा रासायनिक गुणों की व्याख्या निम्नलिखित है-
भौतिक गुण (Physical Properties)
क्षार धातु-परिवार के सदस्यों के महत्त्वपूर्ण भौतिक गुण निम्नलिखित सारणी में सूचीबद्ध हैं।
सारणी-1: क्षार धातुओं के भौतिक गुण (Physical Properties of the Alkali Metals)

1. परमाणु त्रिज्या (Atomic radi)–क्षार धातुओं की परमाणु त्रिज्या ( धात्विक त्रिज्या) का मान अपने आवर्ती में सबसे अधिक होता है तथा ये मान वर्ग में नीचे जाने पर बढ़ते जाते हैं।
किसी परमाणु के नाभिक के केन्द्र से संयोजकता कोश में उपस्थित बाह्यतम इलेक्ट्रॉन के बीच की दूरी परमाणु त्रिज्या कहलाती है। क्षार धातुएँ, आवर्त का प्रथम तत्व होते हुए, सर्वाधिक परमाणु त्रिज्या रखती हैं, चूंकि इनके संयोजकता कोश में केवल एक इलेक्ट्रॉन होता है। परिणामस्वरूप नाभिक के साथ आकर्षण बल का परिमाण न्यूनतम होता है। वर्ग में नीचे जाने पर इलेक्ट्रॉन क्रोशों की क्ररि वृद्धि के कारण परमाणु त्रिज्या बढ़ती है। इसके अतिरिक्त वर प्रभाव का परिमाण भी बढ़ता है जो परमाणु के नाभिक के साथ संयोजी -इलेक्ट्रॉनों के आकर्षण को कम कर देता है, इसके – नाभिकीय आवेश भी बढ़ता है जो नाभिक तथा इलेक्ट्रॉनों के मध्य आकर्षण को बढ़ा देता है। परन्तु इसका परिमाण आवरण प्रभाव की तुलना में अत्यन्त कम होता है। इस प्रकार परमाणु आकार पर कुल परिमाण द्वारा यह प्रेक्षित होता है कि वर्ग में नीचे जाने पर तत्वों के परमाणु आकार बढ़ते हैं।
2. आयनिक त्रिज्या (Ionic radii)-क्षार धातु परमाणु संयोजी s (ns’)-इलेक्ट्रॉन खोकर एकलसंयोजी धनायन बनाते हैं। ये धनायनी त्रिज्या मूल परमाणु की तुलना में छोटी होती हैं। सारणी-3 के अनुसार आयनिक त्रिज्या के मान वर्ग में नीचे जाने पर बढ़ते हैं। चूंकि एकल संयोजी धनायनों का निर्माण परमाणु के संयोजकता कोश में उपस्थित केवल एक इलेक्ट्रॉन के निष्कासन पर होता है; अतः शेष इलेक्ट्रॉन परमाणु के नाभिक द्वारा अधिक आकर्षित होकर उसके समीप हो जाते हैं। परिणामस्वरूप धनायनों का आकार कम हो जाता है। जैसा कि आयनों का आकार अपने मूल परमाणुओं से सम्बद्ध होता है; इसलिए आयनिक त्रिज्या भी परमाणु त्रिज्या के समान वर्ग में नीचे जाने पर बढ़ती है।
3. आयनन एन्थैल्पी (lonisation enthalpies)-गैसीय अवस्था में किसी उदासीन विलगित परमाणु से सर्वाधिक शिथिल बद्ध (loosely bound) इलेक्ट्रॉन हटाने के लिए आवश्यक ऊर्जा को न्यूनतम मात्रा, आयनन एन्थैल्पी कहलाती है। इसे kJ mol-1 या ev इकाइयों में व्यक्त किया जा सकता है।
1eV= 96.472 kJ mol-1
क्षार धातुओं की आयनन एन्थैल्पी अपने आवर्ती में न्यूनतम होती है तथा वर्ग में नीचे जाने पर यह घटती है। इन तत्वों के प्रथम आयनन ऊर्जा के मान सारणी-1 में दिए गए हैं ।
क्षार धातुओं की आयनन एन्थैल्पी के मान कम होने का कारण इनका परमाणु आकार अधिक होना है। जिसके कारण संयोजी -इलेक्ट्रॉन (ns’) को सरलता से निकाला जा सकता है। आयनन एन्थैल्पी के मान वर्ग में नीचे जाने पर भी घटते हैं; क्योंकि परमाणु त्रिज्या के बढ़ने तथा आवर! प्रभाव को परिमाण अधिक होने पर नाभिक के आकर्षण बल का परिमाण घट जाता है। इसके अतिरिक्त एक ही तत्व के लिए प्रथम तथा द्वितीय आयनन एन्थैल्पी के मानों में बहुत अधिक अन्तर होता है।
उदाहरणार्थ-सोडियम के लिए प्रथम आयनन एन्थैल्पी का मान 496 kJ mol-1 है, जबकि इसकी द्वितीय आयनन एन्थैल्पी का मान 4562 kJmol-1 है। इसका प्रमुख कारण है कि एक इलेक्ट्रॉन खोकर बनने वाला एकल संयोजी धनायन (M+) उच्च सममिताकार तथा समीपवर्ती उत्कृष्ट गैस की स्थायी संरचना को प्राप्त कर लेता है। परिणामस्वरूप दूसरे इलेक्ट्रॉन का निष्कासन अत्यन्त कठिन प्रक्रिया हो जाती है जैसा कि उपर्युक्त उदाहरण में दिए सोडियम के प्रथम तथा द्वितीय आयनन एन्थैल्पी के मानों से स्पष्ट हो जाता है।
4. विद्युत ऋणात्मकता (Electronegativity)–किसी तत्व की विद्युत ऋणात्मकता इसके परमाणु की इलेक्ट्रॉनों (बन्ध के साझे युग्म के लिए) को अपनी ओर आकर्षित करने की क्षमता को कहते हैं। क्षार धातुओं की विद्युत ऋणात्मकता कम होती है जिसका अर्थ है कि इनकी इलेक्ट्रॉन आकर्षित करने की क्षमता कम होती है। विद्युत ऋणात्मकता के मान वर्ग में नीचे जाने पर घटते हैं।
क्षार धातु परमाणुओं का ns1 इलेक्ट्रॉनिक विन्यास होता है जिसका अर्थ है कि इनको प्रवृत्ति इलेक्ट्रॉन त्यागने की होती है न कि ग्रहण करने की। अतः इनकी विद्युत ऋणात्मकता के मान कम होते हैं। चूंकि वर्ग में नीचे जाने पर परमाणु आकार बढ़ते हैं; अतः परमाणु की संयोजी इलेक्ट्रॉन को थामे रखने की क्षमता में क्रमिक कमी आती है। इसलिए वर्ग में नीचे जाने पर विद्युत ऋणात्मकता घटती है।
5. ऑक्सीकरण-अवस्था एवं धन विद्युती गुण (Oxidation states and electropositive characters)–क्षार धातु परिवार के सभी सदस्य अपने यौगिकों में +1 ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करते हैं तथा प्रबल धन विद्युती होते हैं। वर्ग में ऊपर से नीचे जाने पर धन विद्युती गुण बढ़ता है। क्षार धातुओ की आयनन एन्थेपी के भान बहुत कम होने के कारण इनके परमाणुओं में संयोजी इलेक्ट्रॉन खोकर एकल संयोजी धनायन बनाने की प्रवृत्ति बहुत अधिक होती है। परिमाणस्वरूप एन्थैल्पी का मान घटता है; अत: धन विद्युती गुण बढ़ता है।

6. धात्विक लक्षण (Metallic character)- वर्ग 1 के तत्व प्रारूपिक धातुएँ हैं तथा अत्यन्त कोमल हैं। इन्हें चाकू द्वारा सरलता से काटा जा सकता है। वर्ग में ऊपर से नीचे जाने पर इनके धात्विक लक्षणों में अत्यधिक वृद्धि होती है।
किसी तत्व का धात्विक गुण उसके इलेक्ट्रॉन त्यागकर धनायन बनाने की प्रवृत्ति से सम्बन्धित होता है। धात्विक बन्ध की प्रबलता इलेक्ट्रॉन समुद्र (electron sea) में उपस्थित संयोजी इलेक्ट्रॉनों तथा करनेल (kernal) के मध्य आकर्षण बल पर निर्भर करती है। करनेल का आकार जितना छोटा होगा तथा संयोजी इलेक्ट्रॉनों की संख्या जितनी अधिक होगी, धात्विक बन्ध उतना ही प्रबल होगा। दूसरे शब्दों में, धातु की कठोरता धात्विक बन्ध के प्रबल होने पर अधिक होगी। क्षार धातुओं में करनेल बड़े आकार के होते हैं तथा इनमें केवल एक संयोजी इलेक्ट्रॉन होता है। अतः क्षार धातुओं में धात्विक बन्ध दुर्बल होते हैं तथा क्षार धातुएँ कोमल होती हैं। लीथियम सबसे कठोर होता है, चूंकि इसका करनेल सबसे छोटे आकार का होता है।
7. गलनांक तथा क्वथनांक (Melting and boiling points)-क्षार धातुओं के गलनांक तथा क्वथनांक अत्यन्त कम होते हैं जो वर्ग में ऊपर से नीचे जाने पर घटते हैं।
क्षार धातुओं के परमाणुओं को आकार ‘अधिक होता है; अतः क्रिस्टल-जालक में इनकी बन्धन ऊर्जा बहुत कम होतो है। परिणामस्वरूप इनके गलनांक कम होते हैं। वर्ग में नीचे जाने पर परमाणु आकार में वृद्धि के साथ-साथ गलनांक के मान घटते हैं। क्वथनांक कम होने का कारण भी यही होता है।
8. घनत्व (Density)-क्षार धातुएँ अत्यन्त हल्की होती हैं। इस परिवार के पहले तीन सदस्य जल से भी हल्के होते हैं। वर्ग में ऊपर से नीचे जाने पर घनत्व बढ़ता है।
क्षार धातुओं के परमाणुओं का आकार बड़ा होता है; अत: वे अन्तराकाश में अधिक संकुलित (closely packed) नहीं होते हैं तथा इनका घनत्व कम होता है। वर्ग में ऊपर से नीचे जाने पर परमाणु आकार बढ़ने के कारण घनत्व कम होना चाहिए; परन्तु यह बढ़ता है। चूंकि परमाणु आकार के साथ-साथ परमाणु भार भी बढ़ता है जिसका प्रभाव अधिक है; अत: घनत्व (भार/आयतन) वर्ग में नीचे जाने पर। बढ़ता है। इसका एक अपवाद पोटेशियम (K) हैं जिसका घनत्व सोडियम से कम है। इसका मुख्य कारण पोटेशियम के परमाणु आकार तथा परमाणु आयतन में असामान्य वृद्धि है।
9. जलयोजन एन्थैल्पी (Hydration enthalpy)-जलयोजन एन्थैल्पी (A Hd ) वह ऊर्जा है जो जलीय विलयन में आयनों के जलयोजित होने पर मुक्त होती है। क्षार धातु आयनों की जलयोजन एन्थैल्पी निम्नलिखित क्रम में होती है-
Li+ >Na+ >K+ > Rb+ >Cs+
जलयोजन में आयनों तथा चारों ओर उपस्थित जल अणुओं के मध्य आकर्षण होता है। अतः आयन का आकार छोटा होने पर, इस पर आवेश का परिमाण अधिक होगा तथा इनकी जलयोजित होने की क्षमता उतनी ही अधिक होगी। क्षार धातुओं में Li+ आयन की जलयोजन एन्थैल्पी सर्वाधिक होती है। इसलिए लीथियम के लवण अधिकतर जलयोजी प्रवृत्ति के होते हैं (LiC1.2H2O)।
10.ज्वाला में रंग देना(Colouration to the flame)-क्षार धातुओं के यौगिकों (मुख्य रूप से क्लोराइड) को प्लैटिनम के तार पर गर्म करने पर ये ज्वाला को विशिष्ट रंग प्रदान करते हैं।

चूँकि क्षार धातुओं की आयनन एन्थैल्पी बहुत कम होती है; अत: इनके इलेक्ट्रॉनों को उच्च ऊर्जा स्तर तक उत्तेजित करना सरल होता है। जब इन धातुओं को प्लैटिनम की तार पर रखकर ज्वाला दी जाती है। तो ज्वाला की ऊर्जा से इलेक्ट्रॉन नाभिक से दूर उच्च ऊर्जा स्तर पर पहुँच जाते हैं। पुनः जब ये उत्तेजित इलेक्ट्रॉन उच्च ऊर्जा स्तर से निम्न ऊर्जा स्तर पर आते हैं तो विकिरण के रूप में दृश्य प्रकाश उत्सर्जित करते हैं। फलस्वरूप क्षार धातुएँ ज्वाला को विशिष्ट रंग प्रदान करती हैं।
11. प्रकाश-विद्युत प्रभाव (Photoelectric effect)-लीथियम के अतिरिक्त सभी क्षार धातुएँ प्रकाश-विद्युत प्रभाव प्रदर्शित करती हैं। प्रकाश-विद्युत प्रभाव को इस प्रकार परिभाषित किया जा सकता है–“जब किसी धातु की सतह पर निश्चित आवृत्ति की किरणें टकराती हैं तो धातु की सतह से इलेक्ट्रॉन उत्सर्जित होकर निकलते हैं। इसे प्रकाश-विद्युत प्रभाव कहते हैं। दूसरे शब्दों में, धातु की सतह पर फोटॉन के प्रहार से इलेक्ट्रॉनों का उत्सर्जन प्रकाश-विद्युत प्रभाव कहलाता है।
प्रकाश-विद्युत प्रभाव का कारण क्षार धातुओं की न्यूनतम आयनन एन्थैल्पी है। धातु की सतह पर गिरने वाले फोटॉनों के पास इतनी ऊर्जा होती है कि वे इलेक्ट्रॉनों को धातु की सतह से उत्सर्जित कर देते हैं। चूंकि लीथियम के छोटे आकार के कारण इसकी आयनन ऊर्जा अधिक होती है; अतः इस धातु पर गिरने वाला फोटॉन नाभिक और, इलेक्ट्रॉनों के बीच आकर्षण बल को कम करने में सक्षम नहीं होता है। इस प्रकार प्रकाश के.दृश्य क्षेत्र में यह धातु प्रकाश-विद्युत प्रभाव प्रदर्शित नहीं करती।
रासायनिक गुण (Chemical Preperties)
क्षार धातुएँ बड़े आकार तथा कर्म आयनन एन्थैल्पी के कारण अत्यधिक क्रियाशील होती हैं। इनकी क्रियाशीलता वर्ग में ऊपर से नीचे क्रमशः बढ़ती जाती है। इस वर्ग के सदस्यों के महत्त्वपूर्ण रासायनिक गुण निम्नलिखित हैं-
1. वायु के साथ अभिक्रियाशीलता (Reactivity with air)-क्षार धातुएँ वायु की उपस्थिति में मलिन (exposed) हो जाती हैं; क्योकि वायु की उपस्थिति में इन पर ऑक्साइड तथा हाइड्रॉक्साइड की पर्त बन जाती है। ये ऑक्सीजन में तीव्रता से जलकर ऑक्साइड बनाती हैं। लीथियम और सोडियम क्रमशः मोनोक्साइड तथा परॉक्साइड का निर्माण करती हैं, जबकि अन्य धातुओं द्वारा सुपर ऑक्साइड आयन का निर्माण होता है। सुपर ऑक्साइड 0,- बड़े धनायनों; जैसे-K’, RB’ तथा Cs’ की उपस्थिति में स्थायी होता है।
4Li+O2 → 2Li2O (ऑक्साइड)
2Na +O2 → Na2O2 (परॉक्साइड)
M+O2 → MO2 (सुपर ऑक्साइड) (M =K, Rb, Cs)
इन सभी ऑक्साइडों में क्षार की ऑक्सीकरण अवस्था +1 होती है। लीथियम अपवादस्वरूप वायु में उपस्थित नाइट्रोजन से अभिक्रिया करके नाइट्राइड, LisN बना लेता है। इस प्रकार लीथियम भिन्न स्वभाव दर्शाता है। क्षार धातुओं को वायु एवं जल के प्रति उनकी अति सक्रियता के कारण साधारणतया रासायनिक रूप से अक्रिय विलायकों; जैसे-किरोसिन में रखा जाता है।
2. जल के साथ अभिक्रियाशीलता (Reactivity with water)-क्षार धातुएँ, इनके ऑक्साइड, परॉक्साइड तथा सुपर ऑक्साइड भी जल के साथ अभिक्रिया करके हाइड्रॉक्साइड, जो घुलनशील होते हैं तथा क्षार (alkalies) कहलाते हैं, बनाती हैं।
2Na + 2H2O → 2Na+ + 2OH– +H2
Li2O+H2O → 2LiOH
Na2O2 + 2H2O → 2NaOH +H2O2
2KO2 + 2H2O → 2KOH + H2O2 +O2 ↑
यद्यपि लीथियम के मानक इलेक्ट्रोड विभव (E⊖) का मान अधिकतम ऋणात्मक होता है, परन्तु जल के साथ इसकी अभिक्रियाशीलता सोडियम की तुलना में कम है, जबकि सोडियम के E⊖] का मान अन्य क्षार धातुओं की अपेक्षा न्यून ऋणात्मक होता है। लीथियम के इस व्यवहार का कारण इसके छोटे आकार तथा अत्यधिक जलयोजन ऊर्जा का होना है। अन्य क्षार धातुएँ जल के साथ विस्फोटी अभिक्रिया करती हैं। चूँकि अभिक्रिया उच्च ऊष्माक्षेपी होती है तथा विमुक्त होने वाली हाइड्रोजन आग पकड़ लेती है, इसलिए क्षार धातुओं को जल के सम्पर्क में नहीं रखते। क्षार धातुएँ प्रोटॉनदाता (जैसे-ऐल्कोहॉल, गैसीय अमोनिया, ऐल्काइन आदि) से भी अभिक्रियाएँ करती हैं।
3. डाईहाइड्रोजन से अभिक्रियाशीलता (Reactivity with dihydrogen)—लगभग 673K (लीथियम के लिए 1073K) पर क्षार धातुएँ डाइहाइड्रोजन से अभिक्रिया कर हाइड्राइड बनाती हैं। सभी क्षार धातुओं के हाइड्राइड रंगहीन, क्रिस्टलीय एवं आयनिक होते हैं। इन हाइड्राइडों के गलनांक उच्च होते हैं।

हाइड्राइडों का आयनिक गुण Li से Cs तक बढ़ता है। क्षार धातुओं की कम आयनन एन्थैल्पी के कारण इनके परमाणु सरलता से संयोजी इलेक्ट्रॉन खोकर आयनिक हाइड्राइड (M+H–) बनाते हैं। चूंकि आयनन एन्थैल्पी वर्ग में ऊपर से नीचे जाने पर घटती है; अतः धनात्मक आयन बनाने की प्रवृत्ति उसी अनुसार बढ़ती है। इसलिए हाइड्रोइडों का आयनिक गुण भी बढ़ता है।
4. हैलोजेन से अभिक्रियाशीलता (Reactivity with halogens)-क्षार धातुएँ हैलोजेन से शीघ्र प्रबल अभिक्रिया करके आयनिक ऑक्साइड हैलाइड M+X– बनाती हैं।
2M+X2 →2M+ X–
यद्यपि लीथियम के हैलाइड आंशिक रूप से सहसंयोजक होते हैं। इसका कारण लीथियम की उच्च ध्रुवण-क्षमता है। (धनायन के कारण ऋणायन के इलेक्ट्रॉन अभ्र का विकृत होना ‘ध्रुवणता (polarisation) कहलाता है।) लीथियम आयन का आकार छोटा है; अत: यह हैलाइड आयन के इलेक्ट्रॉन अभ्र को विकृत करने की अधिक क्षमता दर्शाता है। चूंकि बड़े आकार का ऋणायन आसानी से विकृत हो जाता है, इसलिए लीथियम आयोडाइड सहसंयोजक प्रकृति सबसे अधिक दर्शाते हैं। अन्य क्षार धातुएँ आयनिक प्रवृत्ति की होती हैं। इनके गलनांक तथा क्वथनांक उच्च होते हैं। गलित हैलाइड विद्युत के सुचालक होते हैं। इनका प्रयोग क्षार धातुएँ बनाने में किया जाता है।
5. अपचायक प्रकृति (Reducing nature)-क्षार धातुएँ प्रबल अपचायक के रूप में कार्य करती हैं। जिनमें लीथियम प्रबलतम एवं सोडियम दुर्बलतम अपचायक है। मानक इलेक्ट्रोड विभव (E⊖), जो अपचायक क्षमता का मापक है, सम्पूर्ण परिवर्तन का प्रतिनिधित्व करता है-
M(s) → M(g) ऊर्ध्वपातन एन्थैल्पी
M(g) → M+(g) + e– आयनन एन्थैल्पी
M+ (g) + H22O → M+ (aq) जलयोजन एन्थैल्पी
स्पष्ट है कि E⊖ का मान जितना कम होगा अपचायक गुण उतना ही अधिक होगा। लीथियम आयन का आकार छोटा होने के कारण इसकी जलयोजन एन्थैल्पी का मान अधिकतम होता है, जो इसके उच्च ऋणात्मक E⊖ मान तथा इसके प्रबल अपचायक होने की पुष्टि करता है।
6. द्रव अमोनिया में विलयन (Solution in liquid ammonia)-क्षार धातुएँ द्रव अमोनिया में घुलनशील हैं। अमोनिया में इनके विलयन का रंग गहरा नीला होता है एवं विलयन प्रकृति में विद्युत का सुचालक होता है।
M+(x+y)NH3 → [M(NH3)x]+ + [NH3)y]–
विलयन का नीला रंग अमोनीकृत इलेक्ट्रॉनों के कारण होता है, जो दृश्य प्रकाश क्षेत्र की संगत ऊर्जा का अवशोषण करके विलयन को नीला रंग प्रदान करते हैं। अमोनीकृत विलयन अनुचुम्बकीय (paramagnetic) होता है, जो कुछ समय पड़े रहने पर हाइड्रोजन को मुक्त करता है। फलस्वरूप, विलयन में ऐमाइड बनता है।
M+ (am)+e– +NH3(2) → MNH2 (am) + 1/2H2(g)
जहाँ ‘am’ अमोनीकृत विलयन दर्शाता है। सान्द्र विलयन में नीला रंग ब्रॉन्ज रंग में बदल जाता है और विलयन प्रतिचुम्बकीय (diamagnetic) हो जाता है।
7. सल्फर तथा फॉस्फोरस के साथ अभिक्रिया (Reaction with sulphur and phosphorus)- क्षार धातुएँ सल्फर तथा फॉस्फोरस से गर्म करने पर अभिक्रिया करके सम्बन्धित सल्फाइड तथा फॉस्फाइड बनाती हैं।

सोडियम फॉस्फाइड सल्फाइड तथा फॉस्फाइड दोनों जल द्वारा जल-अपघटित हो जाते हैं।
