Question -
Answer -
बहिर्जनिक भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ वास्तव में अपनी अन्तिम ऊर्जा सूर्यातप से ही प्राप्त करती हैं। तापक्रम और वर्षण दो महत्त्वपूर्ण जलवायु तत्त्व हैं जो विभिन्न प्रकार से सूर्य द्वारा ही नियन्त्रित होते हैं। ये जलवायु तत्त्व रासायनिक, भौतिक एवं जैविक कारकों को संचालित कर भू-आकृतिक प्रक्रियाओं को गतिशील रखते हैं। इससे चट्टानों में रासायनिक एवं भौतिक अभिक्रियाएँ सम्पन्न होती हैं जिसका परिणाम अपक्षय, बृहत् संचलन एवं अपरदन के रूप में प्रकट होता है।
वास्तव में, समस्त वायुमण्डलीय शक्तियों का स्रोत सूर्य ही है। इसी से ऊर्जा एवं अन्तर्जनित शक्तियाँ नियन्त्रित होती हैं। इसी से प्राप्त प्रति इकाई क्षेत्र पर अनुप्रयुक्त शक्ति को प्रतिबल कहते हैं। ठोस पदार्थ में प्रतिबल धक्का और खिंचाव से उत्पन्न होता है। यही प्रतिबल चट्टानों को तोड़ता है। गुरुत्वाकर्षण प्रतिबल के अतिरिक्त आणविक प्रतिबल से भी धरातल के पदार्थ प्रभावित चट्टानों को तोड़ता है। गुरुत्वाकर्षण प्रतिबल के अतिरिक्त आणविक प्रतिबल से भी धरातल के पदार्थ प्रभावित होते हैं। अतः शक्ति के इन सभी स्रोतों का मूल स्रोत वस्तुतः सूर्य ही है जो अप्रत्यक्ष रूप से अन्य स्रोतों को उत्पन्न करके जलवायु तत्त्वों के रूप में कार्य करता है। यही कारक रासायनिक एवं भौतिक ऊर्जा उत्पन्न करके भू-आकृतिक प्रक्रियाओं द्वारा भूपर्पटी में परिवर्तन उत्पन्न करता है। हमारे धरातल पर विभिन्न प्रकार के जलवायु प्रदेश उपलब्ध हैं। इन प्रदेशों में विभिन्न प्रकार की बहिर्जनिक भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ होती रहती हैं जिसके लिए धरातल पर तापीय प्रवणता, अक्षांशीय दशाएँ, वर्षण एवं अन्य मौसमी दशाएँ उत्तरदायी होती हैं परन्तु इन सभी को नियन्त्रित एवं प्रभावित करने वाला एकमात्र ऊर्जा स्रोत सूर्य ही होता है।