पौधों की विभज्योतकी कोशिकाओं (meristematic cells) और विकास करती पत्तियों एवं फलों में प्राकृतिक रूप से उत्पन्न होने वाले विशेष कार्बनिक यौगिकों को पादप हॉर्मोन्स (phytohormones) कहते हैं। ये अति सूक्ष्म मात्रा में परिवहन के पश्चात् पौधों के अन्य अंगों (भागों) में पहुँचकर वृद्धि एवं अनेक उपापचयी क्रियाओं को प्रभावित एवं नियन्त्रित करते हैं। वेण्ट (Went, 1928) के अनुसार वृद्धि नियामक पदार्थों के अभाव में वृद्धि नहीं होती। पादप हॉर्मोन्स को हम निम्नलिखित पाँच प्रमुख समूहों में बाँट लेते हैं
1. ऑक्सिन
सर्वप्रथम डार्विन (Darwin, 1880) ने देखा कि कैनरी घास (Phalaris conariensis) के नवोभिद् के प्रांकुर चोल (coleoptile) एकतरफा प्रकाश की ओर मुड़ जाते हैं, परन्तु प्रांकुर चोल के शीर्ष को काट देने पर यह एकतरफा प्रकाश की ओर नहीं मुड़ता।
वेण्ट ने इस रासायनिक पदार्थ को ऑक्सिन (auxin) नाम दिया। ऑक्सिन की सान्द्रती तने में वृद्धि को प्रेरित करती है और जड़ में वृद्धि का संदमन करती है। ऑक्सिन के असमान वितरण के फलस्वरूप ही प्रकाशानुवर्तन (phototropism) और गुरुत्वानुवर्तन (geotropism) गति होती है। केनेथ थीमान (Kenneth Thimann) ने ऑक्सिन को शुद्ध रूप में प्राप्त करके इसकी आण्विक संरचना ज्ञात की। ऑक्सिन के कार्यिकी प्रभाव एवं उपयोग
(i) प्रकाशानुवर्तन एवं गुरुत्वानुवर्तन (Phototropism and Geotropism) :
ऑक्सिन की अधिक मात्रा तने के लिए वृद्धिवर्धक (promotional) तथा जड़ के लिए वृद्धिरोधक (inhibition) प्रभाव रखती है।
(ii) शीर्ष प्रभाविता (Apical dominance) :
सामान्यतया पौधों के तने या शाखाओं के शीर्ष पर स्थित कलिका से स्रावित ऑक्सिन पाश्र्वीय कक्षस्थ कलिकाओं की वृद्धि का संदमन (inhibition) करते हैं। शीर्ष कलिका को काट देने से पाश्र्वीय कलिकाएँ शीघ्रता से वृद्धि करती हैं। चाय बागान में तथा चहारदीवारी के लिए प्रयोग की जाने वाली हैज को निरन्तर काटते रहने से झाड़ियाँ घनी होती हैं।
(iii) विलगन (Abscission) :
परिपक्व पत्तियाँ, पुष्प और फल विलगन पर्त के बनने के कारण पौधे से पृथक् हो जाते हैं। ऑक्सिन; जैसे-IAA, IBA की विशेष सान्द्रता का छिड़काव करके अपरिपक्व फलों के विलगन को रोका जा सकता है। इससे फलों का उचित मूल्य प्राप्त होता है।
(iv) अनिषेकफलन (Parthenocarpy) :
अनेक फलों में बिना परागण और निषेचन के भी फल को विकास हो जाता है; जैसे–अंगूर, केला, सन्तरा आदि में। ये फल बीजरहित होते हैं। ऑक्सिन का वर्तिकाग्र पर लेपन करने से बिना निषेचन के फल विकसित हो जाते हैं, इस प्रक्रिया को अनिषेकफलन कहते हैं। बीजरहित फलों में खाने योग्य पदार्थ की मात्रा अधिक होती है।
(v) खरपतवार निवारण (Weed destruction) :
खेतों में प्रायः अनेक जंगली पौधे उग आते हैं, इन्हें खरपतवार कहते हैं। ये फसल के साथ प्रतिस्पर्धा करके पैदावार को प्रभावित करते हैं। परम्परागत तरीके से निराई-गुड़ाई, फसल चक्र अपनाकर खरपतवार नियन्त्रण किया जाता है। 2, 4-D नामक संश्लेषी ऑक्सिन का उपयोग करके एकबीजपत्री फसलों में उगने वाले द्विबीजपत्री खरपतवार को नष्ट किया जा सकता है।
(vi) कटे तनों पर जड़ विभेदन (Root differentiation on Stem cutting) :
अनेक पौधों में कलम लगाकर नए पौधे तैयार किए जाते हैं। ऑक्सिन: जैसे–IBA का उपयोग कलम के निचले सिरे पर करने से जड़े शीघ्र निकल आती हैं। अतः ऑक्सिन का उपयोग मुख्यतया सजावटी पौधों को तैयार करने में किया जाता है।
(vii) प्रसुप्तती नियन्त्रण (Control of Dormancy) :
आलू के कन्द तथा अन्य भूमिगत भोजन संचय करने वाले भागों की प्रसुप्त कलिकाओं के प्रस्फुटन को रोकने के लिए इन्हें कम ताप पर संगृहीत किया जाता है। ऑक्सिने का छिड़काव करके इन्हें सामान्य ताप पर संगृहीत किया जा सकता है। ऑक्सिन कलिकाओं के लिए वृद्धिरोधक का कार्य करते हैं।
2. जिबरेलिन
धान की फसल में बैकेन (फूलिश सीडलिंग-foolish seedling) नामक रोग एक कवक जिबरेली फ्यूजीकुरोई (Gibberella fujitkuroi) से होता है। इसमें पौधे अधिक लम्बे, पत्तियाँ पीली लम्बी और दाने छोटे होते हैं। कुरोसावा (Kurosawa, 1926) ने प्रमाणित किया कि यदि कवक द्वारा स्रावित रस को स्वस्थ पौधे पर छिड़का जाए तो स्वस्थ चौधा भी रोगी हो जाता है। याबुता और हयाशी (Yabuta and Hayashi, 1939) ने कवक के रस से वृद्धि नियामक पदार्थ को पृथक् किया, इसे जिबरेलिन–A (GA) नाम दिया गया। सबसे पहले खोजा गया जिबरेलिन-As है। अब तक लगभग 110 प्रकार के GA खोजे जा चुके हैं।
जिबरेलिन का पादप कार्यिकी पर प्रभाव एवं कृषि या बागवानी में महत्त्व
(i) लम्बाई बढ़ाने की क्षमता (Efficiency of increase the length) :
जिबरेलिन के प्रयोग से आनुवंशिक रूप से बौने पौधे लम्बे हो जाते हैं, लेकिन यह लक्षण उन्हीं पौधों तक सीमित रहता है। जिन पर GA का छिड़काव किया जाता है। GA के उपयोग से सेब जैसे फल लम्बे हो जाते हैं। अंगुर के डंठल की लम्बाई बढ़ जाती है। गन्ने की खेती पर GA छिड़कने से तनों की लम्बाई बढ़ जाती है। इससे फसल का उत्पादन 20 टन प्रति एकड़ बढ़ जाता है।
(ii) पुष्पन पर प्रभाव (Effect of Flowering) :
कुछ पौधों को पुष्पन हेतु कम ताप तथा दीर्घ प्रकाश अवधि (long photoperiod) की आवश्यकता होती है। यदि इन पौधों पर GA का छिड़काव किया जाए तो पुष्पन सुगमता से हो जाता है। द्विवर्षी पौधे एकवर्षी पौधों की तरह व्यवहार करने लगते हैं। GA के इस प्रभाव को बोल्टिग प्रभाव (Bolting effect) कहते हैं। इसका उपयोग चुकन्दर, गाजर, मूली, पत्तागोभी आदि के पुष्पन के लिए किया जाता है।
(iii) अनिषेकफलन (Parthenocarphy) :
GA के छिड़काव से पुष्प से बिना निषेचन के फल बन जाता है। फल बीजरहित होते हैं।
(iv) जीर्णता या जरावस्था (Senescence) :
GA फलों को जल्दी गिरने से रोकने में सहायक होते हैं।
(v) बीजों का अंकुरण (Seed Germination) :
GA बीजों के अंकुरण को प्रेरित करते हैं।
(vi) पौधों की परिपक्वता (Maturity of Plants) :
GA का छिड़काव करने से अनावृतबीजी पौधे शीघ्र परिपक्व होते हैं और बीज जल्दी तैयार हो जाता है।
3. सायटोकाइनिन
सायटोकाइनिन ऑक्सिने की सहायता से कोशिका विभाजन को उद्दीपित करते हैं। एफ० स्कूग (E Skoog) तथा उसके सहयोगियों ने देखा कि तम्बाकू के तने के अन्तस्पर्व खण्ड से अविभेदित कोशिकाओं को समूह तभी बनता है, जब माध्यम में ऑक्सिन के अतिरिक्त सायटोकाइनिन नामक बढ़ावा देने वाला तत्त्व मिलाया गया। इसका नाम काइनेटिने रखा। लेथम तथा सहयोगियों ने मक्का के बीज से ऐसा ही पदार्थ प्राप्त करके इसका नाम जिएटिन (zeatin) रखा। काइनेटिन और जिएटिन सायटोकाइनिन ही हैं। सायटोकाइनिन का कार्यिकी प्रभाव एवं महत्त्व
1. ये पदार्थ कोशिका विभाजन को प्रेरित करते हैं।
2. ये जीर्णता (senescence) को रोकते हैं।
3. कोशिका विभाजन के अतिरिक्त सायटोकाइनिन पौधों के अंगों के
निर्माण को नियन्त्रित करते हैं। यदि तम्बाकू की कोशिकाओं का संवर्धन शर्करा तथा खनिज लवणयुक्त माध्यम में किया जाए तो केवल कैलस (callus) ही विकसित होता है। यदि माध्यम में सायटोकाइनिन और ऑक्सिन का अनुपात बदलता रहे तो जड़ अथवा प्ररोह का विकास होता है। संवर्धन के प्रयोग आनुवंशिक इन्जीनियरी के लिए लाभदायक हैं; क्योंकि नई किस्म के पौधे उत्पन्न करने में कोशिका संवर्धन लाभदायक है।
4. ऐब्सीसिक अम्ल
कार्ल्स एवं एडिकोट ने कपास के पौधे की पुष्पकलिकाओं से एक पदार्थ ऐब्सीसिन (abscisin) प्राप्त किया। इस पदार्थ को किसी पौधे पर छिड़कने से पत्तियों का विलगन हो जाता है। वेयरिंग (Wareing, 1963) ने एसर की पत्तियों से डॉरमिन (dormin) प्राप्त किया, यह बीजों के अंकुरण और कलिकाओं की वृद्धि का अवरोधन करता है। इन दोनों पदार्थों को ऐब्सीसिक अम्ल कहा गया। ऐब्सीसिक अम्ल का कार्यिकी प्रभाव एवं महत्त्व
(i) विलगने (Abscission) :
यह पत्तियों के विलगन को प्रेरित करता है।
(ii) कलिकाओं की वृद्धि एवं बीजों का अंकुरण (Growth of buds and germination of seeds) :
यह कलिकाओं की वृद्धि और बीजों के अंकुरण को रोकता है।
(iii) जीर्णता (Senescence) :
यह जीर्णता को प्रेरित करता है।
(iv) वाष्पोत्सर्जन नियन्त्रण (Control of Transpiration) :
यह रन्ध्रों को बन्द करके वाष्पोत्सर्जन की दर को कम करता है। इसका उपयोग कम जल वाली भूमि में खेती करने के लिए उपयुक्त है।
(v) कन्द निर्माण (TuberFormation) :
आलू में कन्द निर्माण में सहायता करता है।
(vi) कोशिकाविभाजन एवं कोशिका दीर्धीकरण (Cell division and Cell Elongation) :
ऐब्सीसिक अम्ल कोशिका विभाजन तथा कोशिका दीर्धीकरण को अवरुद्ध करता है। ऐब्सीसिक अम्ल बीजों को प्रसुप्ति के लिए प्रेरित करने और शुष्क परिस्थितियों में पौधे का बचाव करता है।
5. एथिलीन
बर्ग (Burge, 1962) ने एथिलीन को पादप हॉर्मोन सिद्ध किया। यह मुख्यत: पकने वाले फलों से निकलने वाला गैसीय हॉर्मोन होता है। एथिलीन का कार्यिकी प्रभाव एवं महत्त्व
(i) पुष्पन (Flowering) :
यह सामान्यतया पुष्पन को कम करता है, लेकिन अनन्नास में पुष्पन को प्रेरित करता है।
(ii) विलगने (Abscission) :
यह पत्ती, पुष्प तथा फलों के विलगन को तीव्र करता है।
(iii) पुष्प परिवर्तन (Flower Modification) :
कुकरबिटेसी कुल के पौधों में एथिलीन नर पुष्पों की संख्या को कम करके मादा पुष्पों की संख्या को बढ़ाता है।
(iv) फलों को पकना (Fruit Ripening) :
यह फलों को पकाने में सहायक होता है। (आम,केला, अंगूर आदि फलों को पकाने के लिए इथेफोन (ethephon) का प्रयोग औद्योगिक स्तर पर किया जा रहा है। इससे पके फल
प्राकृतिक रूप से पके फलों के समान होते हैं। इथेफोन से एथिलीन गैस निकलती है।)