Question -
Answer -
दीप्तिकालिता पौधों के फलने-फूलने, वृद्धि, पुष्पन आदि पर प्रकाश की अवधि (photoperiod) का प्रभाव पड़ता है। पौधों द्वारा प्रकाश की अवधि तथा समय के प्रति अनुक्रिया को दीप्तिकालिता (photoperiodism) कहते हैं। (अथवा) दिन व रात के परिवर्तनों के प्रति कार्यात्मक अनुक्रियाएँ दीप्तिकालिता कहलाती है। दीप्तिकालिता. ‘ शब्द का प्रयोग गार्नर तथा एलार्ड (Garmer and Allard, 1920) ने किया।
(क)
दीप्तिकालिता के आधार पर पौधों को मुख्य रूप से तीन समूहों में बाँट लेते हैं
1. अल्प प्रदीप्तकाली पौधा (Short day plant)
2. दीर्घ प्रदीप्तकाली पौधा (Long day plant)
3. तटस्थ प्रदीप्तकाली पौधा (Photo neutral plant)
अल्प प्रदीप्तकाली पौधों को मिलने वाली प्रकाश अवधि को कम करके और दीर्घ प्रदीप्तकाली पौधों को अतिरिक्त प्रकाश अवधि प्रदान करके पुष्पन शीघ्र कराया जा सकता है।
(ख)
कायिक शीर्षस्थ या कक्षस्थ कलिका उपयुक्त प्रकाश अवधि प्राप्त होने पर ही पुष्प कलिका में रूपान्तरित होती है। यह परिवर्तन फ्लोरिजन (florigen) हॉर्मोन के कारण होता है जो दिन और रात्रि के अन्तराल के कारण संश्लेषित होता है। वसन्तीकरण कम ताप काल में पुष्पन को प्रोत्साहन वसन्तीकरणं कहलाता है। कुछ पौधों में पुष्पन गुणात्मक या मात्रात्मक तौर पर कम तापक्रम में अनावृत होने पर निर्भर करता है। इस गुण को वसन्तीकरण कहते हैं। वसन्तीकरण शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम टी०डी० लाइसेन्को (T.D. Lysenko, 1928) ने किया था। गेहूँ की शीत प्रजाति को वसन्त ऋतु में बोने योग्य बनाने के लिए इसके भीगे बीजों को 10-12 दिन तक 3°C ताप पर रखते हैं और फिर वसन्ती गेहूँ के साथ बोने से यह वसन्ती गेहूं के साथ ही पककर तैयार हो जाता है। पौधों में कायिक वृद्धि कम होती है। कम ताप उपचार से पौधे की कायिक अवधि कम हो जाती है। अनेक द्विवर्षी पौधों को कम तापक्रम में
अनावृत कर दिए जाने से पौधों में दीप्तिकालिता के कारण पुष्पन की अनुक्रिया बढ़ जाती है। वसन्तीकरण के फलस्वरूप द्विवर्षी पौधों में प्रथम वृद्धिकाल में ही पुष्पन किया जा सकता है। पौधों में शीत के प्रति प्रतिरोध क्षमता बढ़ जाती है। वसन्तीकरण द्वारा पौधों को प्राकृतिक कुप्रभावों; जैसे-पाला, कुहरा आदि से बचाया जा सकता है।