MENU

Chapter 13 विद्युत धारा का चुम्बकीय प्रभाव (Magnetic Effects of Electric Current) Solutions

Question - 31 : -
मान लीजिए आप किसी चैम्बर में अपनी पीठ को किसी एक दीवार से लगाकर बैठे हैं। कोई इलेक्ट्रॉन पुंज आपके पीछे की दीवार से सामने वाली दीवार की ओर क्षैतिजतः गमन करते हुए किसी प्रबल चुंबकीय क्षेत्र द्वारा आपके दाई ओर विक्षेपित हो जाता है। चुंबकीय क्षेत्र की दिशा क्या है?

Answer - 31 : -

स्पष्टत: फ्लेमिंग के वामहस्त नियम द्वारा, चुंबकीय क्षेत्र की दिशा उर्ध्वाधरत: नीचे (Vertically downward) होगी।

Question - 32 : -
विद्युत मोटर का नामांकित आरेख खींचिए। इसका सिद्धांत तथा कार्यविधि स्पष्ट कीजिए। विद्युत मोटर में विभक्त वलय का क्या महत्व है?

Answer - 32 : -

विद्युत मोटर का आरेख आकृति में दर्शाया गया है:
सिद्धांत-किसी धारावाही चालक को किसी चुंबकीय क्षेत्र के लंबवत् दिशा में रखने पर वह चालक यांत्रिक बल का अनुभव करता है। इस बल के कारण चालक बल की दिशा में घूर्णन करता है। विद्युत धारावाही चालक पर आरोपित बल की दिशा फ्लेमिंग के वामहस्त नियम से ज्ञात करते हैं।
कार्य विधि-चित्र में दर्शाए अनुसार विद्युत धारा चालक ब्रुश X से होते हुए कुंडली ABCD में प्रवेश करती है तथा चालक ब्रुश Y से होते हुए बैट्री के दूसरे टर्मिनल पर वापस आ जाती है।
स्पष्टतः भुजा AB में विद्युत धारा A से B की ओर तथा भुजा CD में C से D की ओर प्रवाहित होती है। अतः धारा की दिशाएँ इन भुजाओं में परस्पर विपरीत होती हैं, इसलिए फ्लेमिंग के वामहस्त नियम द्वारा AB आरोपित बल उसे अधोमुखी धकेलता है जबकि भुजा CD पर आरोपित बल उपरिमुखी धकेलता है। अतः इस बल युग्म के कारण कुंडली तथा धुरी अक्ष पर वामावर्त घूर्णन करते हैं।
विभक्त वलय का कार्य-विद्युत मोटर में विभक्त वलय दिक्परिवर्तक का कार्य करता है। चित्रानुसार विभक्त वलय P तथा Q का संपर्क क्रमशः ब्रुश X तथा Y से है, परंतु आधे घूर्णन के बाद Q का संपर्क ब्रुश X से होता है तथा P का संपर्क Y से होता है, जिसके फलस्वरूप कुंडली में धारा उत्क्रमित होकर पथ DCBA के अनुदिश प्रवाहित होती है। फ्लेमिंग के नियम से अब भुजा AB पर उपरिमुखी तथा भुजा CD पर अधोमुखी बल लगता है, जिसके कारण कुंडली तथा धुरी उसी दिशा में अब आधा घूर्णन और पूरा कर लेती हैं। अतः प्रत्येक आधे घूर्णन के बाद धारा के उत्क्रमित होने का क्रम दोहराता रहता है, जिसके कारण कुंडली तथा धुरी निरंतर घूर्णन करते रहते हैं।

Question - 33 : -
ऐसी कुछ युक्तियों के नाम लिखिए जिनमें विद्युत मोटर उपयोग किए जाते हैं।

Answer - 33 : -

विद्युत मोटर एक ऐसी युक्ति है, जिसमें विद्युत ऊर्जा का यांत्रिक ऊर्जा में रूपांतरण होता है। इसके कुछ उदाहरण निम्न हैं-विद्युत पंखे, ए०सी०, वाशिंग मशीन, मिक्सर ग्राईन्डर, कूलर, कंप्यूटर, जल पंप, गेहूँ पीसने वाली चक्की इत्यादि।

Question - 34 : -
कोई विद्युत रोधी ताँबे के तार की कुंडली किसी गैल्वनोमीटर से संयोजित है। क्या होगा यदि कोई छड़ चुंबकः
(i) कुंडली में धकेला जाता है।
(ii) कुंडली के भीतर से बाहर खींचा जाता है।
(iii) कुंडली के भीतर स्थिर रखा जाता है।

Answer - 34 : -

  1. कुंडली में एक प्रेरित धारा उत्पन्न होता है, जिसके कारण गैल्वनोमीटर में विक्षेप होता है।
  2. प्रेरित धारा उत्पन्न होगी और गैल्वनोमीटर में विक्षेप प्रदर्शित होगा, परंतु विक्षेप की दिशा पहले के विपरीत होगी।
  3. चूंकि चुंबक स्थिर है इसलिए कोई प्रेरित धारा उत्पन्न नहीं होगी। अतः गैल्वनोमीटर में कोई विक्षेप नहीं होती है।

Question - 35 : -
दो वृत्ताकार कुंडली A तथा B एक-दूसरे के निकट स्थित हैं। यदि कुंडली A में विद्युत धारा में कोई परिवर्तन करें तो क्या कुंडली B में कोई विद्युत धारा प्रेरित होगा? कारण लिखिए।

Answer - 35 : -

हाँ, कुंडली B में विद्युत धारी प्रेरित होगी।
जब कुंडली A में प्रवाहित विद्युत धारा में परिवर्तन होता है, तो इसके चुंबकीय क्षेत्र में भी परिवर्तन होता है। चूंकि कुंडली B कुंडली A के निकट है इसलिए कुंडली B के चारों ओर भी. चुंबकीय क्षेत्र रेखाओं में परिवर्तन होता है, जिसके कारण कुंडली B में प्रेरित धारा उत्पन्न होती है।

Question - 36 : -
निम्नलिखित की दिशा को निर्धारित करने वाली नियम लिखिए-
(i) किसी विद्युत धारावाही सीधे चालक के चारों ओर उत्पन्न चुंबकीय क्षेत्र।
(ii) किसी चुंबकीय क्षेत्र में, क्षेत्र के लंबवत् स्थित, विद्युत धारावाही सीधे चालक पर आरोपित बल।
(iii) किसी चुंबकीय क्षेत्र में किसी कुंडली के घूर्णन करने पर उस कुंडली में उत्पन्न प्रेरित विद्युत धारा।

Answer - 36 : -

1. किसी विद्युत धारावाही सीधे चालक के चारों ओर उत्पन्न चुंबकीय क्षेत्र की दिशा निर्धारित करने के लिए दक्षिण-हस्त अंगुष्ठ नियम” का प्रयोग किया जाता है, जो इस प्रकार है किसी विद्युत धारावाही चालक को अपने दाहिने हाथ से पकड़ने पर अँगूठा विद्युत धारा की दिशा को संकेत करता है तथा अँगुलियाँ चुंबकीय क्षेत्र की क्षेत्र रेखाओं की दिशा में लिपटी होंगी। इसे मैक्सवेल का कार्कस्कू नियम भी कहते हैं।
2. किसी चुंबकीय क्षेत्र में, क्षेत्र के लंबवत् स्थित, विद्युत धारावाही सीधे चालक पर आरोपित बल की दिशा ‘‘फ्लेमिंग
के वामहस्त नियम” द्वारा ज्ञात करते हैं, जो इस प्रकार है
संकेत-‘महत्त्वपूर्ण तथ्य’ के अंतर्गत पृष्ठ संख्या-208 देखें।
3. चुंबकीय क्षेत्र में गतिशील चालक में उत्पन्न प्रेरित धारा की दिशा ज्ञात करने के लिए फ्लेमिंग के दक्षिण-हस्त के नियम का प्रयोग किया जाता है।
संकेत-‘महत्त्वपूर्ण तथ्य’ (Point 14) देखें।’

Question - 37 : -
नामांकित आरेख खींचकर किसी विद्युत जनित्र का मूल सिद्धांत तथा कार्यविधि स्पष्ट कीजिए। इनमें ब्रुश का क्या कार्य है?

Answer - 37 : -

विद्युत जनित्र का नामांकित आरेख-
मूल सिद्धांत-विद्युत जनित्र मूलत: विद्युत-चुंबकीय प्रेरण के सिद्धांत पर कार्य करती है। विद्युत जनित्र में यांत्रिक ऊर्जा का उपयोग चुंबकीय क्षेत्र में रखे किसी चालक को घूर्णी गति प्रदान करने में किया। जाता है जिसके कारण प्रेरित विद्युत धारा उत्पन्न होती है, जिसकी दिशा फ्लेमिंग के दक्षिण-हस्त वलय नियम द्वारा ज्ञात की जाती है।

कार्य विधि-मान लीजिए कि प्रारंभिक अवस्था में एक कुंडली ABCD चुंबक के ध्रुवों के बीच उत्पन्न चुंबकीय क्षेत्र में दक्षिणावर्त घुमाया जाता है। भुजा AB ऊपर की ओर तथा भुजा CD नीचे। की ओर गति करती है। फ्लेमिंग का दक्षिण-हस्त नियम लागू करने पर कुंडली में AB तथा CD दिशाओं के अनुदिश प्रेरित विद्युत धाराएँ प्रवाहित होने लगती हैं। बाह्य परिपथ में B2 से B1 की दिशा में विद्युत धारा प्रवाहित होती है।
अब आधे घूर्णन के बाद CD ऊपर की ओर तथा AB नीचे की ओर जाने लगती है। स्पष्टतः कुंडली के अंदर प्रेरित विद्युत धारा की दिशा बदलकर DCBA के अनुदिश हो जाती है और बाह्य परिपथ में B, से B, की दिशा में प्रवाहित होती है। इस तरह हम देखते हैं कि प्रत्येक आधे घूर्णन के बाद विद्युत धारा की दिशा बदल जाती है।

ब्रुश के कार्य-ब्रुश B1 और B2 वलयों R1 तथा R2 पर दबाकर रखा जाता है, जो कुंडली में प्रेरित धारा को बाह्य परिपथ में पहुँचाने में सहायक होते हैं।

Question - 38 : -
किसी विद्युत परिपथ में लघुपथन कब होता है?

Answer - 38 : -

जब विद्युन्मय तार (धनात्मक तार) तथा उदासीन तार (ऋणात्मक तार) सीधे संपर्क में आ जाते हैं, तब विद्युत परिपथ | में अकस्मात् बहुत अधिक विद्युत धारा हो जाती है और लघुपथन हो जाता है। ऐसा तब होता है जब तारों के विद्युतरोधी आवरण क्षतिग्रस्त हो जाए या साधित्र में कोई दोष हो।

Question - 39 : -
भूसंपर्क तार का क्या कार्य है? धातु के आवरण वाले विद्युत साधित्रों को भूसंपर्कत करना क्यों आवश्यक है?

Answer - 39 : -

भूसंपर्क तार किसी विद्युत परिपथ में सुरक्षा उपाय के रूप में प्रयुक्त होते हैं। खासकर उन साधित्रों में जिनका आवरण धात्विक होता है; जैसे-विद्युत इस्तरी, टोस्टर, मेज़ का पंखा, रेफ्रिजरेटर, कूलर, गीजर आदि। धातु के आवरणों से संयोजित भूसंपर्क तार विद्युत धारा के लिए अल्प प्रतिरोध का चालन पथ प्रस्तुत करता है। इससे यह सुनिश्चित हो जाता है कि साधित्र के धात्विक आवरण में विद्युत धारा का कोई क्षरण होने पर उस साधित्र का विभेव भूमि के विभव के बराबर हो जाएगा। फलस्वरूप इस साधित्र को उपयोग करने वाला व्यक्ति तीव्र विद्युत आघात से सुरक्षित बचा रहता है।

Free - Previous Years Question Papers
Any questions? Ask us!
×