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Question -

आशय स्पष्ट कीजिए-
(क) वो लॉरेंस की तरह, नैसर्गिक जिंदगी का प्रतिरूप बन गए थे।
(ख) कोई अपने जिस्म की हरारत और दिल की धड़कन देकर भी उसे लौटाना चाहे तो वह पक्षी अपने सपनों के गीत दोबारा कैसे गा सकेगा!
(ग) सालिम अली प्रकृति की दुनिया में एक टापू बनने की बजाए अथाह सागर बनकर उभरे थे। [Imp.]



Answer -

(क) अंग्रेजी के कवि डी.एच. लॉरेंस प्रकृति के प्रेमी थे। उनका जीवन प्रकृतिमय हो चुका था। उन्हीं की भाँति सालिम अली भी स्वयं को प्रकृति के लिए समर्पित कर चुके थे। यहाँ तक कि वे स्वयं प्रकृति के समान सहज-सरल, भोले और निश्छल हो चुके थे।
यहाँ नैसर्गिक जिंदगी के प्रतिरूप के दो अर्थ हैं1. प्रकृति में खो जाना; प्रकृतिमय हो जाना। 2. प्रकृति के समान सहज-सरले हो जाना।।

(ख) लेखक कहना चाहता है कि सालिम अली की मृत्यु के बाद वैसा पक्षी-प्रेमी और कोई नहीं हो सकता। सालिम अली रूपी पक्षी मौत की गोद में सो चुका है। अतः अब अगर कोई अपने दिल की धड़कन उसके दिल में भर भी दे और अपने शरीर की हलचल उसके शरीर में डाल भी दे, तो भी वह पक्षी फिर-से वैसा नहीं हो सकता क्योंकि उसके सपने अपने ही शरीर और अपनी ही धड़कन से उपजे थे। वे मौलिक थे। किसी और की धड़कन और हलचल सालिम अली के सपनों को पुनः जीवित नहीं कर सकती। आशय यह है कि उनके जैसा पक्षी-प्रेमी प्रयासपूर्वक उत्पन्न नहीं किया जा सकता।

(ग) सालिम अली प्रकृति के खुले संसार में खोज करने के लिए निकले। उन्होंने स्वयं को किसी सीमा में कैद नहीं किया। वे एक टापू की तरह किसी स्थान विशेष या पशु-पक्षी विशेष से नहीं बँध गए। उन्होंने अथाह सागर की तरह प्रकृति में जो-जो अनुभव आए, उन्हें सँजोया। उनका कार्यक्षेत्र बहुत विशाल था।

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