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Chapter 4 मनुष्यता Solutions

Question - 11 : -
चलो अभीष्ट मार्ग में सहर्ष खेलते हुए,
विपत्ति, विघ्न जो पड़े उन्हें ढकेलते हुए।

Answer - 11 : -

घटे न हेलमेल हाँ, बढ़े न भिन्नता कभी,
अतर्क एक पंथ के सतर्क पंथ हों सभी।

उत्तर-
इन पंक्तियों का अर्थ है कि मनुष्य को अपने निर्धारित उद्देश्य रूपी मार्ग पर प्रसन्नतापूर्वक विघ्न-बाधाओं से जूझते हुए आगे बढ़ते रहना चाहिए। इस मार्ग पर चलते हुए परस्पर भाई-चारे की भावना उत्पन्न करो, जिससे आपसी भेद-भाव दूर हो जाए। इसके अतिरिक्त बिना किसी तर्क के सतर्क होकर इस मार्ग पर चलना चाहिए।

Question - 12 : -
अपने अध्यापक की सहायता से रंतिदेव, दधीचि, कर्ण आदि पौराणिक पात्रों के विषय में जानकारी प्राप्त कीजिए।

Answer - 12 : -

रंतिदेव- भारत के प्रसिद्ध राजा थे। एक बार भीषण अकाल पड़ गया। उस अकाल से तालाब और कुएँ सूख गए। फ़सलें
सूख गईं। राजकोष में अनाज का भंडार समाप्त हो गया। दयालु राजा रतिदेव से अपनी प्रजा का दुख देखा न गया। आखिर प्रजा के सुख-दुख को वे अपना दुख जो समझते थे। उन्होंने प्रजा को अनाज देना शुरू कर दिया। प्रजा की भारी भरकम संख्या के आगे अनाज कम पड़ने लगा, जो बाद में समाप्त हो गया। राज-परिवार को भी अब अकाल के कारण आधा पेट खाकर गुजारा करना पड़ रहा था। ऐसी स्थिति आ गई कि राजा को भी कई दिनों से भोजन न मिला था। ऐसी स्थिति में जब राजा को कई दिनों बाद खाने को कुछ रोटियाँ मिलीं तभी एक भूखा व्यक्ति दरवाजे पर आ गया। राजा से उसकी भूख न देखी गई और उसे खिला दिया। ऐसी मान्यता है कि उनके कृत्य से प्रभावित होकर ईश्वर ने उनका भंडार अन्न-धन से भर दिया।

दधीचि- इनकी गणना भारत के परमदानी एवं ज्ञानी ऋषियों में की जाती है। दधीचि अत्यंत परोपकारी थे। वे तप में लीन रहते थे। उन्हीं दिनों देवराज इंद्र उनके पास आए। साधना पूर्ण होते ही दधीचि ने इंद्र से आने का कारण पूछा। इंद्र ने बताया कि ऋषिवर! आप तो जानते ही हैं कि देवता और दानवों में युद्ध छिड़ा हुआ है। इस युद्ध में दानव, देवों पर भारी साबित हो रहे हैं। देवगण हारने की कगार पर हैं। यदि कुछ उपाय न किया गया तो स्वर्गलोक के अलावा पृथ्वी पर भी दानवों का कब्जा हो जाएगा। ऋषि ने कहा, “देवराज इसमें मैं क्या कर सकता हूँ? मैं तो लोगों की भलाई की कामना लिए हुए तप ही कर सकता हूँ।” इंद्र ने कहा, “मुनिवर, यदि आप अपनी हड्डियाँ दे दो तो इनसे बज्र बनाकर असुरराज वृत्तासुर को पराजित किया जा सकेगा और देवगण युद्ध जीत सकेंगे। इंद्र की बातें सुनकर दधीचि ने साँस ऊपर खींची जिससे उनका शरीर निर्जीव हो गया। उनकी हड्डियों से बने वज्र से असुर मारे गए और देवताओं की विजय हुई। अपने इस अद्भुत त्याग से दधीचि का नाम अमर हो गया।

कर्ण- यह अत्यंत पराक्रमी, वीर और दानी राजकुमार था। वह कुंती का पुत्र और अर्जुन का भाई था जो सूर्य के वरदान से पैदा हुआ था। सूर्य ने उसकी रक्षा हेतु जन्मजात कवच-कुंडल प्रदान किया था जिसके कारण उसे मारना या हराना कठिन था। कर्ण इतना दानी था कि द्वार पर आए किसी व्यक्ति को खाली हाथ नहीं लौटने देता था। महाभारत युद्ध में कर्ण ने दुर्योधन का साथ दिया। कर्ण को पराजित करने के लिए कृष्ण और इंद्र ने ब्राह्मण का रूप धारण कर उससे कवच और कुंडल माँगा। कर्ण समझ गया कि यह उसे मारने के लिए रची गई एक चाल है फिर भी उसने कवच-कुंडल दान दे दिया
और अपनी मृत्यु की परवाह किए बिना अपना वचन निभाया।

Question - 13 : -
‘परोपकार’ विषय पर आधारित दो कविताओं और दो दोहों का संकलन कीजिए। उन्हें कक्षा में सुनाइए।

Answer - 13 : -

‘परोपकार’ विषय पर आधारित कविताएँ और दोहे-
कविता- औरों को हसते देखो मनु, हँसो और सुख पाओ।
अपने सुख को विस्तृत कर लो, सबको सुखी बनाओ।
छात्र पुस्तकालय से ‘कामायनी’ लेकर कविता पढ़ें। (जयशंकर प्रसाद कृत ‘कामायनी’ से)

दोहे- यों रहीम सुख होत है, उपकारी के संग ।
बाँटन वारे को लगै, ज्यो मेहदी को रंग ।।
तरुवर फल नहिं खात है, नदी न संचै नीर।
परमारथ के कारनै, साधुन धरा शरीर ।।

Question - 14 : -
अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध’ की कविता ‘कर्मवीर’ तथा अन्य कविताओं को पढ़िए तथा कक्षा में सुनाइए।

Answer - 14 : -

देखकर बाधा विविध बहु विघ्न घबराते नहीं।
रह भरोसे भाग्य के दुख भोग पछताते नहीं।
काम कितना ही कठिन हो किंतु उकताते नहीं।
भीड़ में चंचल बने जो वीर दिखलाते नहीं।
हो गए इक आन में उनके बुरे दिन भी भले।
सब जगह सब काल में वे ही मिले फूले फले।
आज करना है जिसे करते उसे हैं आज ही।
सोचते कहते हैं जो कुछ कर दिखाते हैं वही।
हो गए इक आन में उनके बुरे दिन भी भले।
सब जगह सब काल में वे ही मिले फूले-फले ।।
(‘अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध”)

Question - 15 : -
भवानी प्रसाद मिश्र की ‘प्राणी वही प्राणी है’ कविता पढ़िए तथा दोनों कविताओं के भावों में व्यक्त हुई समानता को लिखिए।

Answer - 15 : -

भवानी प्रसाद मिश्र की कविता ‘प्राणी वही प्राणी है’ छात्र पुस्तकालय से या इंटरनेट से प्राप्त करें और दोनों कविताओं के भावों की तुलना स्वयं करें।

Question - 16 : -
‘विचार लो कि मर्त्य हो’ कवि ने ऐसा क्यों कहा है? इसे सुमृत्यु कैसे बनाया जा सकता है?

Answer - 16 : -

कवि ने मनुष्य से मर्त्य होने की बात इसलिए कही है क्योंकि-

मानव शरीर नश्वर है। इस संसार में जिसका भी जन्म हुआ उसे एक न एक दिन अवश्य मरना है।
मनुष्य चाहकर भी अपनी मृत्यु को नहीं टाल सकता है।
मनुष्य अच्छे-अच्छे कर्म करके और दूसरों के प्रति सहानुभूति दिखाते हुए परोपकार करके अपनी मृत्यु को सुमृत्यु बना सकता है।

Question - 17 : -
कवि किसके जीने और मरने को एक समान बताता है?

Answer - 17 : -

इस नश्वर संसार में हजारों-लाखों लोग प्रतिदिन मरते हैं। इनकी मृत्यु को लोग थोडे ही दिन बाद भूल जाते हैं। ये लोग अपने स्वार्थ को पूरा करने के लिए ही जीते हैं। उन्हें दूसरों के दुख-पीड़ा से कुछ लेना-देना नहीं होता है। दूसरों के बारे में न सोचने के कारण ऐसे लोगों की मृत्यु से कुछ लेना-देना नहीं होता है। आत्मकेंद्रित होकर अपनी स्वार्थ हित-साधना में लगे रहने वालों के जीने और मरने को एक समान बताया है।

Question - 18 : -
“अखंड आत्मभाव भरने’ के माध्यम से कवि क्या कहना चाहता है?

Answer - 18 : -

अखंड आत्मभाव भरने के माध्यम से कवि यह कहना चाहता है कि लोग एक-दूसरे से वैमनस्य, ईष्र्या, द्वेष आदि भाव न रखें और सारी दुनिया के लोगों के साथ एकता अखंडता बनाए रखने हेतु सभी को अपना भाई मानें। प्रायः लोग जाति-धर्म, भाषा क्षेत्रवाद, संप्रदाय आदि की संकीर्णता में फँसकर मनुष्य को भाई समझना तो दूर मनुष्य भी नहीं समझते हैं। कवि इसी संकीर्णता का त्याग करने और सभी के साथ आत्मीयता बनाने की बात कर रहा है।

Question - 19 : -
मनुष्य किसी अन्य को अनाथ समझने की भूल कब कर बैठता है?

Answer - 19 : -

यह मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति है कि धन आते ही उसके मन में घमंड का भाव आ जाता है। वह अहंकार पूर्ण बातें और आचरण करने लगता है। धन देखकर कुछ लोग उसकी चाटुकारिता करने लगते हैं। ऐसे में वह धनवान व्यक्ति खुद को बलशाली समझने लगता है। धन और बल का मेल होते ही वह अनैतिक आचरण पर उतर आता है। वह दूसरों को अपने से कमजोर और अनाथ समझने लगता है।

Question - 20 : -
हमें किसी को अनाथ क्यों नहीं समझना चाहिए?

Answer - 20 : -

हमें किसी को इसलिए अनाथ नहीं समझना चाहिए क्योंकि जिस ईश्वर से शक्ति और बल पाकर हम स्वयं को सनाथ समझते हुए दूसरों को अनाथ समझते हैं वही ईश्वर दूसरों की मदद के लिए भी तैयार रहता है। उसके लंबे हाथ मदद के लिए सदैव आगे बढ़े रहते हैं। वह अपनी अपार शक्ति से सदा दूसरों की मदद के लिए तैयार रहता है, इसलिए हमें दूसरों को अनाथ नहीं समझना चाहिए।

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