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Question -

” ज़रूरत‘- मर बीरा वहाँ से ले लिया वि, फिर सारा चौक उनके लिए आसानी से नहाँ‘ के बराबर हो जाता हैं“- भगत जी की इस संतुष्ट निस्मृहता की कबीर की इस सू/वेल से तुलना कीजिए-



Answer -

चाह गई चिता महँ, मनुआँ बेपरवाहा
जाको कछु नहि चाहिए, सोइ साहन के सतह।।

उतार 

भगत जी जीवन से पूरी तरह संतुष्ट हैं। उन्हें संचय करने में बिलकुल रुचि नहीं है। जितना सामान चाहिए खरीद लिया। जितना सामान (चूरन) बेचने से गुज़ारा हो जाता है उतना बेच लिया इसके अलावा कुछ नहीं। वास्तव में जो व्यक्ति संतोषी होता है वही शहंशाह है क्योंकि उसे किसी प्रकार की चिंता नहीं होती। उसका मन लापरवाह होता है।

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